Monday, August 19, 2019

દક્ષિણ ગુજરાત વીજ કંપની લી.ગણદેવીના નાયબ ઈજનેર ભરત ભાઈ પટેલ આરટીઆઈ માં તજજ્ઞ કે ....?

દક્ષિણ ગુજરાત વીજ કંપની લી.ગણદેવીના નાયબ ઈજનેર ભરત ભાઈ પટેલ  આરટીઆઈ માં તજજ્ઞ કે ....?
નવસારી જિલ્લાના ગણદેવી તાલુકાના દક્ષિણ ગુજરાત વીજ કંપની લી. ના નાયબ ઈજનેર શ્રી શ્રી ભરત ભાઈ પોતાના જાણકાર, અનુભવી, તજજ્ઞ, કાયદા કાનૂન નો જાણકાર નો માને છે.પરંતુ જમીની હકીકતમાં પર્યાવરણ અને માનવ અધિકાર સંસ્થા ના પ્રદેશ અધ્યક્ષ ડો.આર.આર.મિશ્રા દ્વારા એક માહિતી મગવામાં આવેલ હતી જેના જવાબ માં સદર અધિકારી શ્રી નિરીક્ષણ માટે પત્ર પાઠવેલ હતા .જેના નિરીક્ષણ દરમિયાન પોતે કાયદા કાનૂન નો વિશેષ જાંણકાર માની અરજદાર ઉપર આક્ષેપો લગાવી રહ્યા હતા.અને વલસાડ ના વર્તુળ કચેરીના એક અધિકારી સાથે એમના ગુનો કરેલ હોય એવા આક્ષેપો પણ લગાવેલ હતા. પરંતુ જ્યારે એમની પાસે માહિતી માગવામાં આવી ત્યારે એમની કચેરી દ્વારા ભ્રષ્ટાચાર સાવિત થતા એક જ ફાઈલ તપાસતા એમના તમામ નોલેજ ગુમ થઈ ગયા હતા. સદર અધિકારી દ્વારા કાયદેસર ભ્રષ્ટાચાર મામલે હવે અપીલ સત્તા અધિકારી દ્વારા કરેલ હુકમ મુજબ હવે સંપૂર્ણ માહિતી આપશે એ જોવાનુ બાકી રહ્યુ.
સદર કચેરી ના અધિકારી દ્વારા મા.અ.અ.૨૦૦૫ના કાયદા મુજબ બોર્ડ લગાવેલ છે. જે જોઈ ને જ એમનો શૈક્ષણિક લાયકાત અને ભર્તી પ્રક્રિયા સમજી શકાય. સદર બોર્ડ માં કોઈ સરનામુ કે સંપર્ક નં. ન આપી શુ સાવિત કરવા માગે છે. આજે સદર કચેરી કે નવસારી જિલ્લાના એમના જ મોટા અધિકારી ની કામગીરી શંકાસ્પદ છે. અને અધિકારીઓ ... માસી ભાઈ તરીકે કામ કરી રહ્યા છે. પ્રધાન મંત્રી શ્રી મોદી સાહેબ ની નવી યોજના મુજબ જો ભારતના અન્ય અધિકારીઓ કામગીરી કરે ત્યારે ખરેખર એવા અધિકારીઓ ને સરકારી સેવાલય નો લાભ મળી શકે અને મોઘવારી બેરોજગારી જે ચરમ સીમા એ રાજ કરી રહ્યુ છે. કલમ ૩૭૦ની જેમ ધરતી પર ક્યાં ગાયબ થશે એ શોધવો મુશ્કેલ થશે. જાણકારો ના મંતવ્ય મુજબ આજે દરેક જાગ્રિત નાગરિકો અને વિદ્વાનો નાગરિકો મીડિયા દરેક ને જાગૃત થવાની જરૂર છે. ઉપરોક્ત મુદ્દો હવે ટુંક સમયમાં વિઝિલેંસ તપાસ માટે રવાનો કરવો માટે નાગરિકો જણાવી રહ્યો છે.

भगवान कहां है ..? असली सत्य और परम सत्ता के विषय मे जाने...

 भगवान कहां है ..? असली सत्य और परम सत्ता के विषय मे जाने...

अपने माहिं टटोल - सत्य की खोज
                   एक सम्राट बूढ़ा हो गया था। उसके तीन लड़के थे। और तीनों के बीच में उसे निर्णय करना था कि किसे राज्य को सौंप दे। बड़ी कठिनाई थी। वे तीनों लड़के सभी भांति एक-दूसरे से ज्यादा योग्य थे। तय करना कठिन था– किसकी क्षमता, किसकी योग्यता ज्यादा है। तो उस सम्राट ने अपने बूढ़े नौकर को पूछा, जो कि गांव का एक किसान था। उससे पूछाः मैं कैसे इस बात की पहचान करूं, कैसे इस बात को जानूं कि कौन सा युवक राज्य को सम्हाल सकेगा और विकसित कर सकेगा? उस किसान ने कहाः सरल और छोटी सी तरकीब है। और उसने कोई तरकीब सम्राट को बतलाई। एक दिन सुबह सम्राट ने अपने तीनों लड़कों को बुलाया और उन्हें एक-एक बोरा गेहूं का भेंट किया और कहाः इसे सम्हाल कर रखना। मैं तीर्थयात्रा पर जाता हूं। शायद वर्ष लगें, दो वर्ष लगें। जब मैं लौटूं तो तुम उत्तरदायी होओगे इस अनाज के जो मैंने तुम्हें दिया। इसे सुरक्षित वापस लौटाना जरूरी है। यह दायित्व सौंप कर वह सम्राट तीर्थयात्रा पर चला गया। बड़े लड़के ने सोचाः गेहूं को सम्हाल कर रखना जरूरी है। उसने तिजोड़ी में गेहूं बंद कर दिए और भारी ताले उसके ऊपर लटका दिए, ताकि एक भी दाना खो न जाए और पिता जब लौटे तो उसे पूरे दाने वापस किए जा सकें। उससे छोटे भाई ने सोचाः दाने तिजोड़ी में बंद करके रख दूंगा, पता नहीं पिता कब तक आएं, दाने सड़ जाएं और राख हो जाएं, तो मैं क्या लौटाऊंगा? तो उसने उन दानों को एक खेत में फिंकवा दिया, ताकि उनसे फसल पैदा हो और जब पिता आए तो ताजे दाने उसे वापस दिए जा सकें। लेकिन उसने खेत में इस भांति फिंकवा दिया, जैसा कोई किसान कभी खेत में दानों को नहीं फेंकता है। न तो उसने यह बात देखी कि उस खेत के कंकड़-पत्थर अलग किए गए हैं, न उसने यह देखा कि उस खेत की घास-पात दूर की गई है। उसने इस बात की कोई फिकर न की, वह कोई किसान न था, वह एक राजकुमार था। उसे इस बात का कोई पता भी न था कि गेहूं कैसे पैदा होते हैं, बीज कैसे पौधे बनते हैं। उसने तो गेहूं फिंकवा दिए, जैसे कोई अंधकार में फेंक दे। और जहां फिंकवा दिए, न तो उस जमीन की जांच की गई कि वह जमीन कैसी थी! वहां अनाज पैदा होगा या नहीं होगा! वहां जो घास-पात है, पैदा हुए अनाज को वह समाप्त कर जाएगा, इसका भी कोई ख्याल नहीं रखा गया। और वह निश्चिंत हो गया। और वह निश्चिंत हो गया कि पिता जब आएंगे तब नये दाने वापस किए जा सकेंगे। तीसरे छोटे भाई ने सोचाः दानों को घर में बंद करके रखना तो नासमझी होगी, नष्ट हो जाने के सिवाय और क्या परिणाम होगा! जैसा बड़े भाई ने किया है, वैसा करने को वह राजी न हुआ। दानों को बो देना जरूरी था, लेकिन अंधेरे में, और अपरिचित जमीन पर, और बिना तैयार की गई जमीन पर फेंक देना भी नासमझी थी। शायद, जैसा दूसरे भाई ने किया था, उससे भी दाने नष्ट हो जाएंगे। तो उसने एक खेत तैयार करवाया; उसकी भूमि तैयार करवाई; उसकी मिट्टी बदलवाई; उसके कंकड़-पत्थर दूर किए; उस पर घास-पात ऊगता था, उसे फिंकवाया; उसमें पुराने पौधों की जड़ें थीं, उनको दूर किया; और जब भूमि तैयार हो गई तो उसने वह अनाज उसमें बो दिया। कोई तीन वर्ष बाद पिता वापस लौटा। बड़े लड़के ने तिजोड़ी खोल कर बता दी, वहां राख का ढेर था, और कुछ भी नहीं। पिता ने कहाः मैंने तुम्हें जीवित दाने दिए थे, जिनमें बड़ी संभावना थी, जो विकसित हो सकते थे और हजारों गुना हो सकते थे तीन वर्षों में। लेकिन तुमने उन सारे दानों को मिट्टी कर दिया। जो जीवित थे, वे मृत हो गए; जो संभावना थी, वह समाप्त हो गई; जो विकास हो सकता था, वह नहीं हुआ। राज्य देकर तुम्हें मैं क्या करूंगा? उस राज्य की भी यही दशा हो जाएगी। दूसरे युवक से पूछाः कहां हैं दाने? वह उस पथरीली जमीन पर ले गया, जहां उसने दाने फिंकवा दिए थे। वहां न तो कोई पौधे पैदा हुए थे, न कोई फसल आई थी। और न ही इन तीन वर्षों में वह कभी देखने गया था कि वहां क्या है। वहां तो घास-पात खड़ा हुआ था, वहां तो जंगल था। उसके पिता ने पूछाः कहां हैं दाने? उसने कहाः मैंने तो बो दिए थे। उसके बाद मुझे कोई भी पता नहीं। पिता ने पूछाः कैसी जमीन पर बोए थे? उसने कहा कि यह भी मुझे कुछ पता नहीं, इसी जमीन पर फिंकवा दिए थे। सोचा था, जब जमीन पर बिना बोए इतने पौधे पैदा होते रहते हैं, इतने वृक्ष, इतना घास-पात भगवान पैदा करता है, तो क्या मेरे दानों पर थोड़ी सी कृपा नहीं करेगा? इतनी बड़ी जमीन है, इतना सब पैदा होता है, तो मेरे दानों पर भगवान कृपा नहीं करेगा? लेकिन भगवान ने कोई कृपा नहीं की। वे दाने सड़ गए होंगे, दब गए होंगे, उनमें अंकुर भी नहीं आए होंगे। और हो सकता है अंकुर भी आए हों, तो उनकी जड़ें न पहुंच सकी होंगी जमीन तक, पत्थरों ने रोक ली होंगी। हो सकता है उनकी जड़ें भी पहुंच गई हों, तो वे घास-पात में कहां खो गए होंगे, किसको क्या पता था! न उनकी पहले से भूमि तैयार की गई थी और न पीछे उनकी कोई रक्षा की गई थी। उसके पिता ने कहाः राज्य तुझे भी देने में मैं असमर्थ हूं। क्योंकि जो बीज बोने के पहले यह भी नहीं देखता कि भूमि तैयार है या नहीं, वह राज्य के साथ क्या करेगा, यह भी मैं विचार कर सकता हूं। उसने अपने तीसरे लड़के को पूछा कि क्या हुआ? लड़का उसे खेत पर ले गया। जितने दाने पिता दे गया था, तीन वर्षों में हजारों गुना फसल हो गई थी। फेर बड़ा से बड़ा होता गया था। हर वर्ष जितना पैदा हुआ था, उसको उसने फिर बीज के रूप में प्रयोग किया था। पिता देख कर हैरान हो गया। एक लहलहाता खेत खड़ा हुआ था, जिसमें जिंदगी थी, हवाएं जिसकी सुगंध को दूर तक ले जा रही थीं। सूरज की रोशनी जिसके ऊपर चमक रही थी और प्रसन्न हो रही थी। उसके खेत को देख कर पिता का हृदय भी उतना ही हरा हो उठा और उसने कहाः राज्य को तू ही सम्हाल सकेगा। क्योंकि जो छोटे-छोटे बीजों को भी नहीं सम्हाल सकते, वे इतनी बड़ी विराट संभावनाओं को सम्हालने के मालिक नहीं हो सकते। वह राज्य उस छोटे लड़के को दे दिया गया। यह कहानी मैं क्यों कहता हूं? यह इसलिए मैं कहता हूं कि परमात्मा भी हम सबके पास बीज-रूप में बड़ी संभावनाएं देता है। वह परमात्मा भी हमें एक बड़ा राज्य देने के लिए उत्सुक है। उसकी भी बड़ी गहरी आकांक्षा है कि हमारे जीवन में हरियाली हो, जीवन हो, किरणें हों, खुशी हो, आनंद हो। और हम सबको वह बराबर संपत्ति दे देता है कि तुम इसे बढ़ाओ और विकसित करो। लेकिन हम भी तीन लड़कों की भांति सिद्ध होते हैं। हममें से कुछ लोग तो उस संपत्ति को तिजोड़ियों में बंद कर देते हैं, और मरते वक्त तक वह राख होकर समाप्त हो जाती है। हममें से कुछ उसे बोते हैं, लेकिन खेत की, भूमि की कोई फिकर नहीं करते। तब वह बोई तो जाती है, लेकिन कोई परिणाम नहीं आता। बहुत थोड़े से लोग हैं हमारे बीच, परमात्मा जो हमें देता है उसकी फसल को काटते हैं, उसे विकसित करते हैं। जन्म के साथ उन्हें जो मिलता है, मृत्यु के साथ उससे हजार गुना वे परमात्मा को वापस कर देते हैं। जो आदमी, जन्म के साथ जो कुछ लेकर आता है, मृत्यु के समय अगर हजार गुना वापस करने के लिए उसकी तैयारी नहीं है, तो वह समझ ले कि उसके जीवन में कोई सार्थकता का, कोई कृतार्थता का, कोई आनंद का विकास नहीं होगा। और वह समझ ले, उसने एक बड़े दायित्व से, एक बड़ी रिस्पांसिबिलिटी से पीठ मोड़ ली। और इसके परिणाम में उसे दुख झेलना होगा, पीड़ा और चिंता झेलनी होगी। हम सबको भी जीवन विकास करने को उपलब्ध होता है। लेकिन हम उसके साथ क्या करते हैं? तो आज की सुबह, जैसा कल रात मैंने कहाः मन को बनाना है एक दर्पण, मन को बनाना है एक मंदिर, मन को बनाना है कुछ ऐसा कि परमात्मा उसमें फलित हो सके, प्रतिफलित हो सके, दर्शन पा सकें हम उसके जो जीवन का सत्य है, उपलब्ध हो सकें उसे जो जीवन का सौंदर्य है, प्राण हमारे निनादित हो सकें उससे जो जीवन का संगीत है। उसके लिए पहली बात, जैसे किसान खेत की भूमि तैयार करता है, वैसे ही हमें अपने मन को भी तैयार करना होगा। हमें भी अपने मन की भूमि को तैयार करना होगा। और तैयारी में पहली बात जो करनी होगी वह यह कि मन से सारे कंकड़-पत्थर अलग कर देने होंगे। मन से घास-पात अलग कर देना होगा। मन से उखाड़ फेंकनी होंगी वे सब जड़ें जो न मालूम कितने दिनों से हमारे मन में घर किए हुए हैं, ताकि नई फसल हो सके। इसलिए पहला काम साधक के समक्ष मन की सफाई का है। निश्चित ही यह काम निगेटिव है, नकारात्मक है। कुछ उखाड़ फेंकना है, कुछ हटा देना है, कुछ जला देना है, कुछ मिटा देना है। निश्चित ही पहला काम नकारात्मक है, निषेधात्मक है। कोई मकान बनाता है, पुराने मकान को गिरा देना पड़ता है। तो जो आदमी भी एक नये मन को जन्म देने के लिए उत्सुक हुआ हो, उसे हिम्मत करनी होगी कि वह पुराने मन को मिटाने में, नष्ट करने में समर्थ हो सके, साहसी हो सके। जो आदमी पुराने मन को ही लेकर इस ख्याल में हो कि मैं परमात्मा तक पहुंच जाऊंगा, वह गलती में है। नया मन चाहिए–ताजा, जीवंत, जिससे सारी व्यर्थ की चीजें अलग कर दी गई हों–तब मन की भूमि तैयार होती है और उसमें फिर बीज बोए जा सकते हैं। छोटे-छोटे किसान भी इस बात को भलीभांति जानते हैं, लेकिन बड़े से बड़े मनुष्य भी इस बात को नहीं जानते हैं। मन में कौन सी चीजों की जड़ें हैं जो परमात्मा के बीजों को अंकुरित नहीं होने देती हैं और जिनको हटा देना जरूरी है? और हटाना इसलिए बहुत कठिन है, मालूम होगा, क्योंकि जो चीजें बाधा हैं परमात्मा के आने में, हमने उन्हीं को सहयोगी समझ रखा है। जो द्वार नहीं है, दीवाल है, उसी को हमने द्वार समझ रखा है। और जो मार्ग नहीं है, बाधा है, उसी को हमने मार्ग समझ रखा है। इसलिए हटाने में बड़ी कठिनाई प्रतीत होगी। लेकिन वह कठिनाई आसान हो जाती है, अगर यह दिखाई पड़ जाए कि जिसे हमने सहयोग समझा था, वह विरोध था। और जिसे हमने सहारा समझा था, वह बंधन था। और जिसे हमने स्वतंत्रता समझा था, वह परतंत्रता थी। तो आज की सुबह उन थोड़ी सी कुछ बातों से आपको परिचित कराने की कोशिश करूंगा, जो हमारे मन में परमात्मा की तरफ सबसे बड़ी बाधाएं हैं। लेकिन हजारों वर्षों से किसी बुनियादी भूल के कारण हम उनको बाधाएं नहीं समझ कर सहयोगी समझते रहे हैं। जैसे, पहली बात, और उससे बड़ी कोई दूसरी बाधा नहीं है। पहली बात, ज्ञान सबसे बड़ी बाधा है। थोड़ा सुन कर हैरानी और कठिनाई होगी। जिसे हम ज्ञान जानते हैं, वह परमात्मा की दिशा में सबसे बड़ी बाधा है। क्योंकि जिस मनुष्य को यह ख्याल पैदा हो जाता है कि मैं जानता हूं, उसके जानने के द्वार बंद हो जाते हैं। उसकी आगे की खोज बंद हो जाती है। वह ठहर जाता है, रुक जाता है। उसके मन की यात्रा समाप्त हो जाती है। इसलिए पंडित कभी भी सत्य को नहीं जान पाते हैं। नहीं जान सकेंगे। आज तक किसी पंडित ने सत्य को नहीं जाना है और कभी नहीं जान सकेगा। यह ख्याल पैदा हो जाना कि मैं जानता हूं, इससे बड़ा और कोई अहंकार नहीं है। इससे बड़ी और कोई ईगो, इससे बड़ी और कोई अस्मिता, इससे बड़ा और कोई दंभ नहीं है। सुकरात बूढ़ा हो गया था। कुछ लोगों ने आकर सुकरात को कहाः एथेंस के लोग कहते हैं, सुकरात महाज्ञानी है, परम ज्ञानी है, क्या यह सच है? सुकरात से लोगों ने पूछा। सुकरात ने कहाः जब मैं छोटा था और जब मुझे जीवन का कोई अनुभव नहीं था, और जब मैंने जीवन को जाना नहीं था और जीवन से मैं परिचित न हुआ था, तब मुझे भी यह भ्रम था कि मैं जानता हूं, जब मैं छोटा था, बच्चा था। फिर मैं युवा हुआ, जीवन की बहुत ठोकरें मैंने खाईं, और जीवन के बहुत अंधेरे रास्तों पर मैं भटका, तब धीरे-धीरे मुझे पता चला कि मैं कितना कम जानता हूं! लेकिन तब भी मुझे यह ख्याल बना रहा कि थोड़ा-बहुत मैं जानता हूं। फिर मैं बूढ़ा हुआ, और अनुभव की वर्षा मेरे ऊपर हुई, और नये-नये अनजान, अपरिचित तथ्य मेरी आंखों में उभरे, और धीरे-धीरे मेरे ज्ञान का भवन गिरता गया। अब जब कि मैं मरने के करीब पहुंच गया हूं, मैं अत्यंत स्पष्ट रूप से कह देना चाहता हूंः मुझसे बड़ा अज्ञानी शायद ही कोई हो, मैं कुछ भी नहीं जानता हूं। और जाओ एथेंस के मेरे लोगों को कह देना कि वे ये भूल भरी बातें किसी को न बताएं। वे मुझे प्रेम करते हैं, यह तो ठीक है, लेकिन यह न कहें कि मैं परम ज्ञानी हूं। वे मित्र वापस गए, और उन्होंने एथेंस के समझदार लोगों को कहा कि तुम तो कहते हो कि सुकरात परम ज्ञानी है, लेकिन उसने खुद कहा है कि मैं तो परम अज्ञानी हूं। और उसने कहा है कि जाओ और उनसे कह देना, ऐसी झूठ बात वे न कहें। तो वे वृद्धजन हंसने लगे एथेंस के और उन्होंने कहाः जो अपने को परम अज्ञानी कहता है, उसी के लिए तो परम ज्ञान के द्वार खुल जाते हैं। इसीलिए तो हम कहते हैं कि सुकरात परम ज्ञानी है। जो इस तथ्य को जानने में समर्थ हो गया है कि मैं कुछ भी नहीं जानता, उसका हृदय एकदम सरल और शांत हो जाता है। उसके हृदय की सारी जटिलता विलीन हो जाती है। उसका अहंकार शून्य हो जाता है। वह मिट जाता है एक अर्थों में। उसके मन में तब कोई ख्याल और विचार नहीं रह जाते, तब कोई सिद्धांत और शास्त्र नहीं रह जाते, तब उसके भीतर कोई दावा नहीं रह जाता कि मैं जो कहता हूं वही सही है और दूसरे जो कहते हैं वह गलत है। तब वह कोई दावा नहीं करता। तब वह कोई घोषणा नहीं करता। तब वह कोई विवाद नहीं करता। तब वह कोई तर्क नहीं करता। बल्कि इस शांत अवस्था में कि मैं नहीं जानता हूं, उसका मन मौन हो जाता है। और उसी मौन में वह जान पाता है। स्टेट ऑफ नोइंग, जानने की दशा, और स्टेट ऑफ नॉट नोइंग, न जानने की दशा–दो अवस्थाएं हैं चित्त की। एक चित्त की दशा है, जब हमें लगता है कि हम जानते हैं। क्या जानते हैं लेकिन हम? क्या जानते हैं हम? आदमी क्या जानता है? कौन सा ज्ञान है आदमी के पास? विश्व की सत्ता के संबंध में कौन सी समझ है हमारी? दूर है विश्व की सत्ता, अपने ही संबंध में हम क्या जानते हैं? क्यों होता है जन्म? क्यों आ जाती है मृत्यु? क्या जानते हैं? क्यों चलती हैं श्वासें और क्यों बंद हो जाती हैं? क्या जानते हैं? क्यों हैं हम? हमारे होने की अर्थवत्ता और प्रयोजन क्या है? क्या जानते हैं? जो घर के द्वार पर पौधा लगा है, वृक्ष लगा है, वह भी क्यों है? आकाश में जो बादल उठते हैं, वर्षा करते हैं; सूरज ऊगता है, डूबता है; रात आती है, दिन आते हैं, क्यों हैं ये सब? क्या जानते हैं? क्या है हमारा जानना इस सारे विश्व के प्रति? इस विराट के प्रति? लेकिन अपने संबंध में भी जो मनुष्य कुछ नहीं जानता, वह भी यह ख्याल करता है कि मैं ईश्वर के संबंध में जानता हूं। अपने संबंध में भी जिसे कोई पता नहीं, वह भी यह दावा करता है कि मोक्ष के संबंध में मैं जानता हूं, स्वर्ग और नरक के संबंध में जानता हूं। और न केवल यह दावा करता है कि मैं जानता हूं, बल्कि यह भी दावा करता है कि दूसरे जो जानते हैं वे गलत हैं, जो मैं जानता हूं वही सही है। न केवल दावा करता है, बल्कि तलवारें निकाल कर निर्णय भी करता है कि अगर… हिंदू और मुसलमान, ईसाई और जैन, सिक्ख और पारसी क्या करते रहे हैं? न केवल हम सही हैं, बल्कि अगर कोई और कहता है कि तुम, और भिन्न बात कहता है, तो वह गलत है। न केवल वह गलत है, बल्कि इसका निपटारा हत्या से करने की कोशिश भी हम करते हैं। अदभुत है हमारा ज्ञान! कहना चाहिए अदभुत है हमारा अज्ञान! जीवन के बाबत कुछ भी ज्ञात नहीं है, लेकिन उस अज्ञात सत्य के संबंध में भी हम कल्पनाएं कर लेते हैं और कल्पनाओं पर लड़ते हैं। अनुमान कर लेते हैं, अनुमानों पर लड़ते हैं, हत्याएं करते हैं। सिद्धांतों और शास्त्रों के नाम पर कितने मनुष्यों की हत्या हुई है, कोई हिसाब है? धर्मों के नाम पर कितना खून हुआ है, कोई गणना है? मंदिर और मस्जिदों के नाम पर कितनी आगजनी हुई है, कोई हिसाब है? किसने की है यह? यह जानने वाला आदमी जिसको यह भ्रम है कि मैं जानता हूं! जिसे यह ख्याल है कि मैं जो जानता हूं वह सत्य है! खुद के प्राणों का कोई पता नहीं है और हम दूर के सत्यों के निर्णायक बन जाते हैं। यह जो जानने का भ्रम है, जब तक न छूट जाए, तब तक जानने के द्वार खुलते ही नहीं। ज्ञान के द्वार केवल उसी के लिए खुलते हैं, जो उस द्वार पर बिल्कुल अज्ञानी की भांति खड़ा हो जाता है। और जो कहता हैः मैं तो कुछ भी नहीं जानता हूं, मुझे तो कुछ भी पता नहीं है, मुझे तो जीवन के अ ब स का भी कोई अनुभव नहीं है, मैं तो निपट न जानने वाला हूं। कभी आपने सोचा, कभी आपको यह ख्याल आया है कि आप कुछ भी नहीं जानते हैं? अगर आया है ख्याल, तो आपके जीवन में धर्म की शुरुआत की संभावना है। और अगर आपको यह ख्याल है कि मैं जानता हूं, तो आपके द्वार बंद हो गए। आपकी भूमि तैयार नहीं है। और जानते क्या हैं? सिवाय शब्दों के और क्या जानते हैं? अगर गीता पढ़ ली है, अगर कुरान पढ़ लिया है, या बाइबिल पढ़ ली है, या और शास्त्र पढ़ लिए हैं, जो कि ढेर सारे हैं जमीन पर, जिनकी कोई कमी नहीं है। प्रति सप्ताह कोई पांच हजार ग्रंथ नये छप जाते हैं सारी जमीन पर। प्रति सप्ताह पांच हजार ग्रंथों का प्रकाशन होता है सारी दुनिया में। कोई कमी नहीं है। उन सबको आपने पढ़ लिया, उन सबके शब्द सीख लिए, सूत्र सीख लिए, उनको आप बोलने में समर्थ हो गए, बताने में समर्थ हो गए, तो क्या आप सोचते हैं, ज्ञान उपलब्ध हो गया? बात अगर ऐसी होती, तो सारी दुनिया ज्ञानी हो गई होती। लेकिन शास्त्र तो बढ़ते जाते हैं, साथ ही साथ अज्ञान भी बढ़ता जाता है। यह बड़ी हैरानी की, बड़ी दुविधा की बात मालूम होती है। आदमी का ज्ञान बढ़ता जाता है और हम देखते हैं कि आदमी के भीतर का अज्ञान भी साथ में बढ़ता जाता है। यह कैसे हो रहा है? यह जानने के भ्रम से हो रहा है। जानने का जितना भ्रम होता जाता है, उतना आदमी जटिल और कठोर होता जाता है। उतनी उसकी सरलता, उसकी सिंप्लीसिटी, उसकी ह्युमिलिटी, उसकी विनम्रता, सब खोती चली जाती है। पंडित से ज्यादा अहमन्य और कौन होता है? जिसे यह ख्याल पैदा हो जाता है कि मैं जानता हूं, उसके अहंकार का कोई अंत नहीं है। और इसीलिए तो दो पंडित मिलने को भी राजी नहीं हो पाते हैं। दो बड़े साधुओं को मिलाना कठिन है, दो पंडितों को मिलाना कठिन है। उनके अहंकार बड़े पैने हैं। एक-दूसरे के साथ खड़ा होना कठिन है। आज तक दुनिया को पंडितों के सिवाय और किसने लड़ाया है? किसने तोड़ा है? किसने आदमी आदमी के बीच दीवालें खड़ी की हैं? कौन है इसके लिए जिम्मेवार? ये जानने वाले लोग! और बड़े मजे की बात है, ज्ञान क्या तोड़ने वाला हो सकता है? ज्ञान तो जोड़ेगा। अज्ञान तोड़ता है। तो ज्ञान के नाम से हम जिसका पोषण करते हैं, वह बहुत गहरा अज्ञान है। शास्त्र पढ़ लेने से, शब्द सीख लेने से, सिद्धांतों को स्मरण कर लेने से ज्ञान उत्पन्न नहीं होता, केवल अज्ञान ढंक जाता है। जैसे कोई अपने फोड़े को फूलों से ढांक ले, तो क्या फोड़ा समाप्त हो जाएगा? जैसे कोई अपने रुग्ण शरीर को सुंदर-सुंदर वस्त्रों से ढांक ले, तो क्या शरीर स्वस्थ हो जाएगा? नहीं, बल्कि उसके स्वस्थ होने की संभावनाएं थीं, वे भी समाप्त हो जाएंगी। क्योंकि न केवल दूसरों को धोखा पैदा होगा कि वह आदमी स्वस्थ है, दूसरों का धोखा देख कर उसे खुद भी धोखा पैदा होगा कि मैं स्वस्थ हूं। एक आदमी अपने फोड़े को छिपा ले, दूसरों को दिखाई पड़ना बंद हो जाएगा कि उसका फोड़ा नहीं है। दूसरों को देख कर उसको खुद को यह भ्रम पैदा होना शुरू हो जाएगा कि शायद मेरा फोड़ा मिट गया, क्योंकि कोई उसकी चर्चा नहीं करता। और तब फोड़ा भीतर-भीतर बढ़ेगा और सारे प्राणों पर छा जाएगा। हम अपने अज्ञान को छिपा लेते हैं शब्दों और शास्त्रों की सीख से, सिखावन से। उससे अज्ञान मिटता नहीं, भीतर-भीतर सुलगता रहता है, फैलता रहता है। और इसीलिए तो हमारा ज्ञान एक तरफ होता है, हमारा जीवन दूसरी तरफ होता है। क्योंकि ज्ञान ऊपर का होता है, जीवन भीतर का होता है। इसलिए रोज झंझट खड़ी रहती है। रोज हम कहते हैं कि मैं जानता तो हूं कि ठीक क्या है, लेकिन जब करने का सवाल उठता है, तो वह कर लेता हूं जो गलत है। अगर कोई आदमी जानता है कि ठीक क्या है, तो क्या यह संभव है कि वह गलत कर सके? नहीं, यह असंभव है। जो ठीक को जानता है, वह गलत को नहीं कर सकता। लेकिन हम ठीक को जानते हैं और गलत को करते हैं। यह किस बात की सूचना और खबर है? यह इस बात की सूचना है कि हमारा जानना धोखे का है, झूठा है, शब्दों का है, सत्य का नहीं है। शब्दों को जान लेना बहुत आसान है। किताब पढ़ लेनी कोई कठिन बात है? किताब को याद कर लेना कोई कठिन बात है? स्मृति को भर लेना कोई कठिन बात है? छोटे-छोटे बच्चे सारी दुनिया में क्या कर रहे हैं? स्कूलों में क्या हो रहा है? बातें सिखाई जा रही हैं। एक बच्चा गणित की बातें याद कर लेता है, एक बच्चा भूगोल याद कर लेता है, एक दूसरा बच्चा गीता याद कर लेता है। इन तीनों में कोई फर्क है? लेकिन भूगोल को जानने वाले के हम पैर नहीं छूते और न उसे ज्ञानी कहते हैं। हम जानते हैं कि यह थोड़ी सी इनफार्मेशन इसने सीख ली भूगोल की, इसने इतिहास थोड़ा सा पढ़ लिया, तो ठीक है। लेकिन वही बच्चा गीता याद कर ले, तो ज्ञानी हो जाता है। और गीता याद करने में और इतिहास याद करने में कोई फर्क है? कोई भेद है? कोई अंतर है? कोई भी अंतर नहीं है। जो स्मृति इतिहास याद करती है, वही स्मृति गीता याद कर लेती है। लेकिन इतिहास वाले को हम ज्ञानी नहीं कहते, तो गीता जानने वाले को ज्ञानी कैसे कहने लगे? इतिहास भी एक किताब है, और गीता भी, और कुरान भी, और बाइबिल भी। किताबें पढ़ लेने से ज्ञान उत्पन्न नहीं होता, केवल स्मृति परिपक्व होती है, स्मृति में कुछ बातें बैठ जाती हैं। स्मृति बिल्कुल यांत्रिक है, मेकेनिकल है, उसमें कुछ भी डाल दो। अब ये टेप रिकार्ड कर रहे हैं, मैं बोल रहा हूं तो टेप कर रहे हैं। मैं अगर यहां भजन गाऊं, तो भजन टेप हो जाएगा; गालियां दूं, तो गालियां टेप हो जाएंगी; अच्छी बातें कहूं, तो वे टेप हो जाएंगी; बुरी बातें कहूं, तो वे टेप हो जाएंगी। टेप एक मशीन है, उसे इससे कोई फर्क नहीं कि मैं क्या कहता हूं, उसका काम है वह रिकार्ड कर लेगा। आदमी की स्मृति एक यंत्र है। आप इतिहास पढ़ें, तो इतिहास याद हो जाएगा; गीता पढ़ें, गीता याद हो जाएगी; भजन पढ़ें, भजन; फिल्म का गीत पढ़ें, तो फिल्म का गीत याद हो जाएगा। स्मृति ज्ञान नहीं है, स्मृति तो केवल संग्राहक यंत्र है। इस संग्राहक यंत्र को जो ज्ञान समझ लेता है, उसके रास्ते बंद हो गए, उसकी आगे की खोज बंद हो गई। और यह जो सारा ज्ञान है, यह फिर उसके ऊपर बोझ की भांति बैठ जाता है। उसके मस्तिष्क को बोझिल कर देता है, भारी कर देता है, विवादग्रस्त कर देता है, तर्क से भर देता है, उपद्रव से भर देता है। उसके भीतर की शांति चली जाती है, उसके भीतर की चैन चली जाती है। और उसके भीतर अज्ञान मौजूद बना रहता है। और उसे यह भी भ्रम पैदा हो जाता है कि मैं जानता हूं। बंगाल में एक बहुत बड़ा तर्कशास्त्री हुआ। कहते हैं बंगाल ने वैसा दूसरा बुद्धिमान आदमी पैदा नहीं किया। तर्क में बड़ी उसकी कुशलता थी। शास्त्रों में बड़ी उसकी गति थी। शायद ही कोई ऐसा महत्वपूर्ण शास्त्र हो, जो उसे कंठस्थ न हो। और शायद ही कोई ऐसी बात हो, जिसके पक्ष में वह खड़ा हो जाए, तो उसे हराना आसान हो। वह एक दिन सुबह-सुबह ही गांव के तेली की दुकान पर तेल खरीदने गया था। तो तेल खरीदा, तेली के पीछे ही कोल्हू चल रहा था, उसका बैल चल रहा था, तेल को पेर रहा था। कोई उसे चला नहीं रहा था, बैल अपने आप चल रहा था। तो उस तर्कशास्त्री पंडित ने पूछा उस तेली कोः बड़े आश्चर्य की बात है, यह बैल अपने आप चल रहा है! कोई इसे चलाता नहीं? उस तेली ने कहाः देखते नहीं हैं, गले में घंटी बांध दी है। जब तक घंटी बजती रहती है, मैं जानता हूं कि बैल चल रहा है। जब घंटी बंद हो जाती है, मैं उठ कर फिर हांक देता हूं। तर्कशास्त्री पंडित बोलाः बड़ी हैरानी की बात है, बैल बड़ा नासमझ है। खड़े होकर सिर को क्यों नहीं हिलाता कि घंटी बजती रहे? उस तेली ने कहाः महाराज! यह पंडित नहीं है, सीधा-सादा बैल है। इसे न शास्त्रों का पता है, न तर्कशास्त्र का कोई पता है। और आप कृपा करें और जल्दी यहां से चले जाएं। आपकी छाया भी खतरनाक हो सकती है। हो सकता है यह बैल भी खड़े होकर घंटी बजाने लगे। तो मैं बड़ी मुश्किल में पड़ जाऊंगा। मनुष्य के जीवन की सारी सरलता उसके पांडित्य और ज्ञान ने छीन ली। इसीलिए तो सारी दुनिया में आदमी खड़े होकर घंटी बजा रहा है। कोई कोई काम नहीं करना चाहता है। तो खड़े होकर, उसको पता हो गया, खड़े हो जाओ और घंटी बजाते रहो। घंटी बजती रहेगी, समझा जाएगा कि काम हो रहा है। जीवन की सब दिशाओं में हमारे ज्ञान ने हमें बड़ी हैरानी में डाल दिया। और यह ज्ञान बिल्कुल ज्ञान नहीं है। और यह ज्ञान बिल्कुल ही यांत्रिक शिक्षण है। इस यांत्रिक शिक्षण को ज्ञान समझ लेना, और इसको मान्यता देनी, इससे बड़ी और कोई बाधा नहीं है। कुछ भी हम जानते नहीं हैं। और जो भी हमारी अटकलबाजियां हैं–और हमारी पूरी फिलासफी अटकलबाजियों के सिवाय और कुछ भी नहीं है। जमीन का हमें पता नहीं है, आकाश के हमने हिसाब लगा लिए। भगवान के कितने चेहरे हैं, यह भी हमने पता लगा लिया। भगवान कहां हैं, कैसे रहते हैं, इसका भी हमने सब हिसाब लगा लिया। हमने भगवान की मूर्तियां और फोटो भी बना लिए। और सारी दुनिया पर हर आदमी स्वतंत्र है खोज कर लेने को, बना लेने को, कल्पना कर लेने को। सारी दुनिया में न मालूम कितनी कल्पनाएं खड़ी हो गई हैं। उन्हीं कल्पनाओं को हम धर्म समझ रहे हैं–उन्हीं अटकलबाजियों को, अंधेरे में टटोली गई बातों को। और फिर उनको सीख लेते हैं, और उनको पकड़ लेते हैं, और उनको पकड़ कर जड़ हो जाते हैं। सोच-विचार भी खो जाता है, चेतना का जागरण भी खो जाता है। एक बात इसलिए सबसे पहली जान लेनी जरूरी है, बड़ी उलटी मालूम पड़ेगी, जिसे सचमुच ज्ञान की दुनिया में प्रवेश करना हो, उसे इस तथाकथित ज्ञान को, यह जो सो-काल्ड नॉलेज है, जो किताबों और शब्दों से मिलती है, इसे छोड़ देने की हिम्मत करनी होगी। यह पत्थर है, इसे निकाल फेंकना होगा। यह घास-पात है, जिसे खेत से अलग कर देना होगा। यह क्यों है ज्ञान झूठा? यह झूठा इसलिए है, क्योंकि यह उधार है, बारोड है। जो मेरा ज्ञान नहीं है, वह ज्ञान नहीं हो सकता। किसी और ने जाना हो, उसके लिए ज्ञान होगा। लेकिन उसके शब्द मेरे लिए ज्ञान नहीं हो सकते, वे मेरे लिए केवल स्मृति होंगे। उसके लिए होगी नॉलेज, मेरे लिए होगी मेमोरी। उसके लिए होगा ज्ञान, मेरे लिए होंगे शब्द, स्मृति। और मैं भ्रम में पड़ जाऊंगा। महावीर ने जाना होगा; बुद्ध ने जाना होगा; कृष्ण ने जाना होगा; क्राइस्ट ने जाना होगा। लेकिन उनके शब्द मेरे लिए ज्ञान नहीं बन सकते। आप जानते होंगे। लेकिन आपके शब्द मेरे लिए ज्ञान नहीं बन सकते। ज्ञान वैसा ही है जैसी मृत्यु है। आप मर जाएं, मुझे मरने का कोई अनुभव नहीं होता। मैं मर जाऊं, आपको मरने का कोई अनुभव नहीं होता। मृत्यु जैसे वैयक्तिक है, एकदम इंडिविजुअल है। एक आदमी मरता है, वही जानता है कि क्या होता है। वैसा ही ज्ञान भी वैयक्तिक है। एक आदमी जानता है, वही जानता है कि क्या है। और जब दूसरे से कहता है, तो दूसरे के पास पहुंचते हैं शब्द–थोथे और खाली। जैसे खाली कारतूस, जिसके पीछे कोई गोली नहीं है, ऐसे खाली शब्द पहुंच जाते हैं दूसरों के पास। और दूसरे उनको इकट्ठा कर लेते हैं। और इकट्ठा करने में रस लेने लगते हैं। और जितने खाली शब्द उनके पास बहुत हो जाते हैं, उतना उनको लगने लगता है कि मैं जानता हूं। शब्द बिल्कुल खाली हैं। मैंने सुना है, एक महाकवि समुद्र के किनारे था। सुबह जब वह समुद्र के किनारे पहुंचा, सूरज को उगते उसने देखा। बड़ी सुखद और शांत सुबह थी। और समुद्र की लहरें थीं, और उन लहरों पर तैरती आती हुई हवा थी–बड़ी शीतल, बड़ी आनंददायी, बड़ी आह्लाद से भरने वाली। उसके मन में हुआ–उसकी प्रेयसी दूर, हजारों मील दूर एक अस्पताल में बीमार पड़ी थी–उसके मन में हुआ कि ये सुंदर, सुखद हवाएं थोड़ी सी एक डिब्बे में बंद करके मैं अपनी प्रेयसी के पास पहुंचा दूं। उसने एक बड़ी खूबसूरत संदूक बनवाई, उसमें समुद्र की हवाओं को बंद किया और ताला लगाया और एक पत्र लिखा और पेटी को भिजवाया हवाई जहाज से अपनी पत्नी, अपनी प्रेयसी के पास। और पत्र में लिखा कि मैंने जानीं इतनी सुंदर हवाएं, कि मेरा मन हुआ कि तुम्हें भी भागीदार बनाऊं। और तुम हो दूर, और तुम हो बीमार, तुम्हें तो समुद्र तक लाना संभव नहीं है, इसलिए मैं समुद्र की हवाएं ही तुम्हारे पास पहुंचाए देता हूं। उसकी प्रेयसी ने बड़ी खुशी से, बड़ी आतुरता से वह पेटी खोली, लेकिन क्या पाया? वहां तो कुछ भी न था! वह तो पेटी खाली थी! समुद्र की हवाएं बंद करके नहीं भेजी जा सकतीं। यह तो हो सकता है कि हम समुद्र के पास चले जाएं और उसकी ताजी हवाओं को जानें; यह नहीं हो सकता कि उसकी ताजी हवाओं को पेटियों में बंद करके हमारे पास लाया जा सके। यह तो हो सकता है कि परमात्मा के किनारे हम पहुंच जाएं और उसको जान लें; यह नहीं हो सकता कि जो परमात्मा को जाने वह शब्दों में बंद करके खबरें हमारे पास भेज दे, और हम उन शब्दों को पकड़ लें और जान लें, यह नहीं हो सकता। ऐसा उधार ज्ञान पाने का कोई रास्ता नहीं है। परमात्मा निजी अनुभव है। एकदम निजी अनुभव है। एकदम वैयक्तिक। कोई लेन-देन नहीं हो सकता। कोई किसी को दे नहीं सकता उस अनुभव को। लेकिन शब्द हम दे सकते हैं। और शब्दों को देने से यह भ्रम पैदा हो जाता है, जिसके पास शब्द हो जाते हैं, उसे लगता है कि मैंने जाना। शब्द एक इल्युजन पैदा कर देते हैं, एक भ्रम पैदा कर देते हैं। शब्दों से ज्यादा मायावी और कुछ भी नहीं है। शब्दों से बड़ा जादू और कुछ भी नहीं है। शब्द हम सीख लेते हैं और सोचते हैं कि बस हो गई बात, हो गई बात, बात खतम हो गई। शब्दों पर बात खतम नहीं होती। और जो आदमी शब्दों पर रुक रहता है, उसकी जिंदगी जरूर व्यर्थ हो जाती है। शब्दों पर कोई बात खतम नहीं होती है। और जहां तक जीवन की असलियत का संबंध है, वहां हम सब भलीभांति इतने होशियार हैं कि वहां हम शब्दों से राजी नहीं होते। लेकिन जहां सत्य, अनुभूतियों और परमात्मा का संबंध है, वहां हम शब्दों से राजी हो जाते हैं। बड़ी हैरानी की बात है! अगर कोई आपसे धन की बातें करे, तो आप कहेंगेः हो चुकी बातचीत, धन कहां है? अगर कोई आपसे महलों की बातचीत करे, तो आप कहेंगेः हो चुकी बातचीत, लेकिन महल कहां है? बातचीत से क्या होगा? जहां तक पदार्थ, जहां तक संसार का संबंध है, हम सब बहुत होशियार हैं, और हम शब्दों से धोखे में नहीं आते हैं। लेकिन जहां तक परमात्मा का संबंध है, हम बड़े अजीब लोग हैं, हम एकदम शब्दों के धोखे में आ जाते हैं। और हम कहीं नहीं पूछते कि ठीक है, यह तो शब्द हो गया, यह गीता तो ठीक, कुरान तो ठीक, लेकिन परमात्मा कहां है? एक सम्राट के द्वार पर एक कवि आया, और उस कवि ने उस सम्राट की प्रशंसा में बहुत गीत कहे। बड़े मधुर थे वे गीत; और बड़े मीठे थे शब्द; और बड़ी स्तुति थी उनमें। सम्राट हुआ बहुत प्रसन्न। और उसने सारे गीत सुन कर कहा अपने वजीर कोः कल दस हजार स्वर्णमुद्राएं भेंट कर देना इस कवि को, अदभुत है यह कवि। और कवि से कहाः बहुत हुआ आनंद, बहुत हुआ आनंद, कल आना और दस हजार स्वर्णमुद्राएं भेंट कर दूंगा। कवि तो आसमान में उड़ गया। वह तो नाचता हुआ घर लौटा। दस स्वर्णमुद्राएं मिल जातीं तो भी खुश होता। दस हजार स्वर्णमुद्राएं! रात सो नहीं सका, रात भर सपने उठते रहे। रात भर बुनता रहा, हिसाब करता रहा–क्या करूंगा, क्या नहीं करूंगा। दस हजार स्वर्णमुद्राओं की तो कल्पना भी न थी। मुंह अंधेरे ही, सूरज भी नहीं निकलता था, वह राजा के द्वार पर पहुंच गया। द्वार खुले, तो वह बाहर खड़ा हुआ था। राजा ने उससे पूछाः कैसे आए? वह थोड़ा हैरान हुआ। उसने कहाः आप भूल गए क्या? कल आपने कहा था, दस हजार स्वर्णमुद्राएं देंगे। राजा हंसने लगा, उसने कहाः बातों-बातों में तुमने मुझे प्रसन्न किया था, बातों-बातों में मैंने भी तुम्हें प्रसन्न किया। इसमें लेने-देने का कहां संबंध है? तुमने कुछ अच्छी बातें कही थीं, मैं खुश हुआ। मैंने एक अच्छी बात कही, ताकि तुम खुश हो जाओ। इसमें रुपये कहां आते हैं? इसमें रुपयों का क्या वास्ता है? तुमने भी कविता कही, हमने भी कविता कही। हम जरा शब्दों की कविता नहीं कर सकते, हम रुपयों की कविता करते हैं। तो हमने भी एक कविता कही। वह भी एक पोएट्री थी। तुम भी कवि हो, हम भी कवि हैं। तुम शब्दों के कवि हो, हम रुपयों और धन के कवि हैं। तो बात खतम हो गई, उसके आगे लेने-देने का क्या संबंध है? लेकिन कवि को यह तो दिखाई पड़ गया कि रुपयों की बात कविता हो तो उसको भी धक्का लगा। लेकिन उसको खुद शायद ही यह कभी दिखाई पड़ा होगा कि उसकी कविताएं भी कोरी और थोथी शब्दों से ज्यादा नहीं हैं, उनमें भी कुछ नहीं है। हम शब्दों के व्यामोह में पड़ते हैं और उसे ज्ञान समझ लेते हैं। यह ज्ञान नहीं है। यह पहली शर्त है, इस ज्ञान को थोथा और भ्रामक समझना जरूरी है जो हमने दूसरों से सीख लिया है। और हमने सब तो दूसरों से सीखा हुआ है! अगर मैं पूछूंः ईश्वर है? और आप कहेंः है। तो क्या आप सोचते हैं, आपने ईश्वर को जाना? सुना है, सीखा है। लोग कहते हैं कि है, आप भी कहते हैं कि है। हिंदू से पूछें, तो वह कुछ और कहता है। मुसलमान से पूछें, वह कुछ और कहता है। बौद्ध से पूछें, वह कुछ और कहता है। जैन से पूछें, वह कुछ और कहता है। क्या वे सब जानते हैं? नहीं, जो उन्होंने सुना है, वह कहते हैं। क्योंकि उन्होंने भिन्न बात सुनी है, इसलिए वे भिन्न बात कहते हैं। आपने भिन्न बात सुनी है, आप भिन्न बात कहते हैं। रूस में चले जाएं, वहां के लड़कों से पूछेंः ईश्वर है? वे कहते हैंः नहीं है। क्या वे जानते हैं कि ईश्वर नहीं है? नहीं, उनकी हुकूमत उनको यही समझा रही है कि नहीं है। वे यही सुनते हैं, यही कहते हैं। रूस के बच्चे कहते हैंः ईश्वर नहीं है। हिंदुस्तान के बच्चे कहते हैंः ईश्वर है। हिंदू का बच्चा कहता हैः पुनर्जन्म है। ईसाई का बच्चा कहता हैः पुनर्जन्म नहीं है। यह ज्ञान है या कि शिक्षा है? सिखाई गई बातें हैं। जो बातें बचपन से दोहराई जा रही हैं, वे हम सीख लेते हैं। उन्हीं के आधार पर हम अपने ज्ञान को खड़ा करते चले जाते हैं। यह सारा ज्ञान का भवन झूठा है। इसके आधार झूठे हैं। जो चीज सिखाई जाती है, वह झूठी होती है। जो बात जानी जाती है, वह और होती है। जानना और सीखने में फर्क है। विज्ञान सिखाया जा सकता है, धर्म सिखाया नहीं जा सकता। इसलिए विज्ञान के कालेज हो सकते हैं, युनिवर्सिटी हो सकती है; धर्म का कोई कालेज, कोई युनिवर्सिटी नहीं हो सकती। विज्ञान सिखाया जा सकता है, क्योंकि विज्ञान बाहर के जगत से संबंधित है। जो बाहर के जगत से संबंधित है, वह सिखाया जा सकता है। वह हमसे बाहर है, हम सब उसे देख सकते हैं, हम सब उस पर निरीक्षण कर सकते हैं, हम सब उस पर प्रयोग कर सकते हैं। हम सबके लिए वह कॉमन ऑब्जेक्ट है। हम सबके लिए सबके बीच सामूहिक पदार्थ है। लेकिन धर्म सिखाया नहीं जा सकता, क्योंकि वह आंतरिक है। और सबके समक्ष सामने खड़ा नहीं किया जा सकता, सामूहिक रूप से प्रयोग नहीं हो सकता, सामूहिक परीक्षण नहीं हो सकता, सामूहिक निरीक्षण, ऑब्जर्वेशन नहीं हो सकता। धर्म है नितांत गूढ़ और आंतरिक। उसे कोई स्वयं तो जान सकता है, लेकिन कोई दूसरा इशारा नहीं कर सकता कि यह है। परमात्मा की तरफ अंगुली नहीं उठाई जा सकती, पदार्थ की तरफ अंगुली उठाई जा सकती है। परमात्मा को पकड़ कर मौजूद नहीं किया जा सकता, पदार्थ को पकड़ कर मौजूद किया जा सकता है। इसलिए परमात्मा को सिखाया नहीं जा सकता, जाना जा सकता है। और बड़ा मजा यह है कि जो लोग परमात्मा को सीख लेते हैं, वे जानने से वंचित रह जाते हैं। क्योंकि सिखावन होगी उधार, दूसरों की। और उसको ही अगर उन्होंने पकड़ लिया, तो वे उसको ही सत्य मान कर रुक जाएंगे। और तब उस ज्ञान तक कैसे पहुंचेंगे जो उनके भीतर है और कभी बाहर से नहीं आता है? इसलिए आज की सुबह पहली जो बुनियादी बात आपसे मैं कहना चाहता हूं, वह यहः आपने सुना होगा, दूसरे लोग ज्ञान सिखाते हैं, मैं अज्ञान सिखाता हूं। ज्ञान छोड़ना चाहिए। स्टेट ऑफ नॉट नोइंग जो है, अज्ञान की जो सरल अवस्था है, वह बड़ी अदभुत है, बड़ी क्रांतिकारी है। एक अनाथालय में मैं गया था। वहां के बच्चों को वे धर्म की शिक्षा देते हैं। तो मैंने उनसे पूछाः क्या सिखाते होंगे? क्योंकि मैं तो समझ ही नहीं पाता कि धर्म सिखाया जा सकता है। असंभव है यह बात। सिखाया जा सकता होता, तो पांच हजार साल हो गए, अब तक आदमी धार्मिक हो गया होता। और हमने सब बातें तो सिखा दी हैं। एक-एक आदमी जानता है कि ईश्वर है, आत्मा है, मोक्ष है, फलां है, ढिकां है, कर्म है, यह है, वह है, हर आदमी जानता है। लेकिन कोई आदमी धार्मिक नहीं हो गया इस वजह से। बल्कि यह जो इस तरह की बातें जानने वाले लोग हैं, बड़े खतरनाक हैं। इस तरह के जानने वाले लोग हमेशा उपद्रव में ले जाते हैं, अधर्म में ले जाते हैं। जो आदमी रोज गीता पढ़ता है, कल वह मस्जिद जलाने की सलाह दे सकता है। जो आदमी रोज मस्जिद में नमाज पढ़ता है, वह कल मंदिर में आग लगाने की सलाह दे सकता है। बड़े खतरनाक लोग हैं। इनका यह जो ज्ञान है, यह ज्ञान कोई प्रेम नहीं लाता दुनिया में। यह ज्ञान कोई दुनिया में शांति नहीं लाता; युद्ध लाता है, हिंसा लाता है। तो यह ज्ञान तो धार्मिक बनाता नहीं किसी को, फिर भी आप क्या सिखाते हैं? तो उन्होंने कहाः आप आएं और बच्चों से पूछ लें। मैं गया। उन्होंने खुद ही पूछाः ईश्वर है? उन सारे बच्चों ने हाथ उठा दिए। उनको सिखाया था। उनको परीक्षा देनी थी। उनको बताया गया था, जब हम पूछें–ईश्वर है? तो तुम कहना–हां, ईश्वर है। उन्होंने हाथ उठा दिए। वे हाथ बिल्कुल झूठे हैं। उन बच्चों को कोई भी पता नहीं कि ईश्वर है या नहीं है। लेकिन वे हाथ उठा रहे हैं। बुनियाद रखी जा रही है असत्य की। इसी बुनियाद पर उनके जीवन भर का भवन खड़ा हो जाएगा। यह बुनियाद झूठी है। इन बच्चों को कोई भी पता नहीं। और इतना बड़ा असत्य जिन बच्चों को हम सिखा रहे हैं, हम अगर आशा करें कि जीवन में वे सत्यवादी हो जाएंगे, तो निहायत नासमझी की बात है। इतना बड़ा असत्य हम उन बच्चों को सिखा रहे हैं! जिनको कोई पता नहीं, उनको हम कह रहे हैं, ईश्वर है। और जो कह रहा है, बड़ा मजा यह है, उसे भी कोई पता नहीं, उसे भी किसी ने सिखाया है। मैंने उनके अध्यापक के कान में पूछाः तुम्हें पता है ईश्वर के होने का? वे कहे कि मुझे तो नहीं, लेकिन हां, है तो जरूर, क्योंकि सब कहते हैं। इन बच्चों को भी सिखा दिया। आत्मा है? उन बच्चों ने कहाः है। कहां है? उन्होंने अपने हृदय पर हाथ रख दिए, यहां। मैंने एक छोटे बच्चे से पूछा कि हृदय कहां है? उसने कहाः यह तो हमें बताया नहीं गया। जो बताया गया, वह हम बता सकते हैं। जो नहीं बताया गया, वह हम कैसे बता सकते हैं? हृदय कहां है, यह उसे पता नहीं; लेकिन आत्मा कहां है, तो वह कहता है, यहां है। यह हाथ कितना झूठा है! लेकिन यह सीख लिया जाएगा, और जिंदगी भर, जब भी प्रश्न उठेगा और जिज्ञासा पैदा होगी और इंक्वायरी पैदा होगी कि आत्मा कहां है, यह झूठा हाथ मशीन की तरह यहां चला जाएगा और कहेगा, यहां। यह गेस्चर बिल्कुल झूठा है। यह हाथ का उठना बिल्कुल झूठा है। हम सबके हाथ भी उठेंगे, अगर मैं आपसे पूछूंः आत्मा कहां है? तो आप कहेंगेः यहां। यह हाथ भी वही हाथ है, जो बच्चे का उठा कर लगा दिया गया था। बूढ़े हो जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। बचपन में सीखी गई आदतें काम करती रहती हैं। आपसे पूछेंः आत्मा कहां है? कहेंगेः यहां। आपने जाना है यहां क्या है? कोई पता नहीं उसका कि यहां क्या है, लेकिन हाथ उठता है और चला जाता है। ये जो सारी तरकीबें हैं, ये शिक्षाएं नहीं हैं, बल्कि इस अहसास के कारण कि मुझे पता है, आत्मा यहां है, कभी आप आत्मा को खोजते भी नहीं। क्योंकि जिसे यह ख्याल पैदा हो गया कि मुझे मालूम है, वह खोजेगा क्यों? हमारी खोज बंद हो गई है सारी दुनिया में धर्म की, इस कारण से नहीं कि नास्तिक बढ़ गए हैं, इस कारण से नहीं कि विज्ञान बढ़ गया है, इस कारण से नहीं कि लोग बुरे हो गए हैं, कलियुग आ गया है। ये सब निहायत बेवकूफी की बातें हैं। बल्कि इस कारण कि धार्मिक लोगों ने शिक्षा दे-दे कर हमारे मन इतने ज्ञान से भर दिए हैं कि हमारी खोज बंद हो गई, हमारी इंक्वायरी बंद हो गई। इसका जिम्मा नास्तिकों पर नहीं है, न भौतिकवादियों पर है। इसका जिम्मा धार्मिक शिक्षकों पर है, रिलीजस टीचर्स पर है। जो सिखाए जा रहे हैं कि यह है, यह है, यह है। और जो यह भी सिखाते हैं कि संदेह मत करना, नहीं तो भटक जाओगे; विश्वास कर लेना, हम जो कहते हैं, उस पर। ये जो सिखा रहे हैं लोग, ये जो ज्ञान देने वाले लोग हैं, ये हैं शत्रु मनुष्य-जाति के। इन्होंने हमारे हृदय को, हमारे मस्तिष्क को ऐसे थोथे शब्दों से भर दिया है जिनकी कोई प्रतीति हमें नहीं है। और तब हम एकदम उधार आदमी हो गए हैं, बारोड। अपनी कोई आत्मा नहीं है जिनके पास। होगी कैसे? जिसके पास अपना कोई ज्ञान नहीं है, उसके पास अपनी कोई आत्मा, अपना कोई बल होता है? जिसका सब ज्ञान दूसरों से आता हो, वह भीतर एकदम सत्वहीन हो जाता है, इंपोटेंट हो जाता है। उसके भीतर कोई बल नहीं रह जाता। वह कुछ भी नहीं जानता है। उसकी सारी दीवालें ज्ञान की खींची जा सकती हैं, और उसको पता चलेगा कि यह तो मैं नहीं जानता हूं। धोखा अपने को दिया जा सकता है ऐसे ज्ञान से। लेकिन ऐसे ज्ञान से न कभी कोई मुक्त होता है, न कभी कोई सत्य को जानता है। तो मैंने कहाः इन बच्चों के साथ बड़ा दुर्व्यवहार, बड़ा अनाचार कर रहे हो। आज तक अधिक मां-बाप और शिक्षकों ने यह किया है। बच्चों के धार्मिक होने की सारी संभावनाएं बंद कर दी हैं। इसके पहले कि उनकी जिज्ञासा पैदा हो, हम उनको शब्द पकड़ा देते हैं, वे शब्द से तृप्त हो जाते हैं। वह तृप्ति झूठी है, और उस तृप्ति की वजह से फिर उनकी खोज बंद हो जाती है, उनकी प्यास समाप्त हो जाती है। क्या करें? शब्दों को हटा दें अपने मन से। आपके भीतर एक लपटती हुई प्यास पैदा होगी जानने की। ज्ञान को हटा दें और आपका अज्ञान आपके प्राणों के भीतर एक प्यास बन जाएगा कि मैं जानूं! क्या है, मैं जानूं! ज्ञान का भ्रम टूट जाए, तो ज्ञान की यात्रा शुरू होती है। और जो ज्ञान के खूंटों से बंधे रहते हैं, उनकी कभी यात्रा शुरू नहीं होती। तो पहला निषेधात्मक काम हैः ज्ञान से छुटकारा। यह बड़ा कठिन है। क्योंकि अज्ञान से कोई कहे छूट जाओ, तो हमको खुशी होती है। क्योंकि अज्ञान से छूटने में हमारे अहंकार की तृप्ति होगी। और मैं कहता हूं, ज्ञान से छूट जाओ, तो बड़ी घबड़ाहट होती है। क्योंकि ज्ञान तो हमारा अहंकार है। अहंकार से छूटने में बड़ी बेचैनी होती है। कि अगर मैंने ज्ञान छोड़ दिया, मैं हो गया अज्ञानी। कल चार लोग कहते थेः पंडितजी, आप जानते हैं। और मैं खुद ही कहूं कि मैं कुछ नहीं जानता, तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। कल चार लोग पैर छूते थे, कहते थेः तपस्वी हैं, ज्ञानी हैं। वही कहेंगे कि अरे, ये तो खुद ही नहीं जानते। सारी कठिनाई वहां अहंकार की है। तो ज्ञान छोड़ने वाले को साहसी होना पड़ेगा, इस दंभ को छोड़ने का। और एक क्षण में यह हो सकता है, इसके लिए कोई पहाड़ नहीं खोदने पड़ेंगे। यह बोध आ जाए कि सच मैं जो जानता हूं, उसमें मेरा कितना है जो मैंने जाना है? इसकी थोड़ी सी परख, और सारा भवन गिर जाएगा, जैसे ताश के पत्तों का भवन हवा के एक झोंके में गिर जाए। उससे ज्यादा श्रम नहीं पड़ेगा। क्योंकि भवन के नीचे कोई बुनियाद नहीं है, कोई आधार नहीं है, अधर में लटका हुआ भवन है। तरकीब है मन को कंडीशन करने की, जो हजारों साल से धर्मगुरु, राजनीतिज्ञ उपयोग कर रहे हैं और आदमी को गुलाम बनाए हुए हैं। पावलफ हुआ रूस में एक वैज्ञानिक। उसने जिंदगी भर कुत्तों के ऊपर कुछ प्रयोग किए। एक कुत्ते को वह रोज रोटी देता। रोटी सामने आती, तो कुत्ते के मुंह से लार टपकने लगती। स्वाभाविक है। रोटी सामने हो, कुत्ता भूखा हो, लार टपकेगी। लेकिन वह साथ ही साथ जब रोटी खिलाता, तो साथ में एक घंटी भी बजाता जाता। पंद्रह दिन बाद, रोटी तो नहीं दी उसने, सिर्फ घंटी बजाई, कुत्ते के मुंह से लार टपकने लगी। अब घंटी बजने से और कुत्ते के मुंह से लार टपकने का कोई प्राकृतिक संबंध नहीं है। रोटी के साथ तो प्राकृतिक संबंध है, लेकिन घंटी के साथ क्या संबंध है? लेकिन पंद्रह दिन में संबंध स्थापित हो गया। एक फाल्स रिलेशन, एक झूठा संबंध पैदा हो गया। रोटी दी जाती थी, साथ में घंटी बजती थी, दोनों के बीच संयोग हो गया कुत्ते के मन में। रोटी और घंटी साथ-साथ ख्याल में आ गए। अब रोटी मिलती थी तो घंटी बजती थी, तो घंटी बजेगी तो रोटी मिलेगी, ऐसा मन में संबंध हो गया। पंद्रह दिन बाद घंटी बजती है, कुत्ते के मुंह से लार टपकने लगी। घंटी के साथ रोटी का ख्याल संयुक्त हो गया। इसको पावलफ ने कहा… यह बड़ी क्रांतिकारी खोज थी। इसके इंप्लिकेशंस, इसके अंतर्गर्भित अर्थ बहुत गहरे हैं। एक छोटे से बच्चे को ले जाते हैं आप एक मंदिर में और कहते हैंः ये भगवान हैं। बच्चे को कोई भगवान वहां दिखाई नहीं पड़ता। अगर बच्चे को दिखाई पड़ता होता, तो आपको बताने की कोई जरूरत न पड़ती। आप हाथ जोड़ते हैं और बच्चे से कहते हैंः हाथ जोड़ो। अगर बच्चे को भगवान दिखाई पड़ रहे होते, तो वह खुद ही हाथ जोड़ लेता। बच्चे को तो दिख रहा है कि पत्थर की एक मूर्ति रखी है। बच्चे को तो सचाई दिख रही होगी, आपको भला भगवान दिख रहे हों। बच्चा आपकी तरह अभी बेईमान नहीं हो गया है। बच्चा आपकी तरह चालाक भी नहीं है, बच्चा अभी कंडीशंड भी नहीं है, अभी उसके दिमाग को कुछ पता नहीं है। सीधा-साफ उसको तो दिखाई पड़ रहा होगा कि एक पत्थर की मूर्ति रखी है। और अगर आप बाधा न दें तो हो सकता है पत्थर की मूर्ति उठा कर घर ले आए, खेल-खिलौना बना ले। बच्चे को कोई कठिनाई नहीं होगी, सीधी-सीधी बात है। लेकिन आप कहते हैं कि भगवान हैं। पिता को बच्चा मानता है बड़ा, आदरणीय। वे जो कहते हैं, जरूर ठीक कहते होंगे। जो जानते हैं, जरूर ठीक जानते होंगे। क्योंकि उनकी बात पर शक करने का मतलब पिट जाना, परेशान होना है। तो ठीक है। ताकतवर हैं, वे ठीक ही कहते होंगे। फिर जब उनको हाथ जोड़ते देखता है, और गांव के लोगों को हाथ जोड़ते देखता है, वह भी हाथ जोड़ कर खड़ा हो जाता है। यह हाथ जोड़ना उसके चित्त में बिल्कुल झूठी घटना है। इसका उसके प्राणों से कोई संबंध नहीं है। इसका उसके अनुभव से कोई नाता नहीं है। फिर रोज-रोज यह क्रिया चलती है। पच्चीस वर्ष का वही जवान उस मंदिर के सामने से निकलता है तो उसके हाथ उठ जाते हैं। यह वही घटना है, जो कुत्ते के मुंह से लार टपक गई घंटी बजते देख कर। इसमें कोई फर्क नहीं है, इसमें कोई भेद नहीं है। यह कंडीशनिंग है। ये चित्त को बांधने की तरकीबें हैं, और कुछ भी नहीं। इसमें न भगवान के प्रति हाथ उठ रहे हैं, न कोई भगवान से संबंध है इस बात का। कोई नाता नहीं है इससे भगवान का, इसका धर्म से कोई संबंध नहीं है। यह तो सिर्फ पच्चीस वर्ष की शिक्षा, संयोग, अब वह भयभीत हो गया। मेरे एक मित्र हैं, मुझसे बात करते थे, उनको बात समझ में आ गई। तो जिस मंदिर के सामने से निकल कर वे रोज नमस्कार करते थे, उनको बात समझ में आ गई होगी, तो वे एक दिन बिना नमस्कार किए निकल गए। सांझ को मेरे पास आए और बोलेः बड़ी मुश्किल हो गई। बीस-पच्चीस कदम तो मैं हिम्मत करके चला गया कि न करूं नमस्कार, लेकिन बीस-पच्चीस कदम के बाद मुझे एकदम पसीना आने लगा और हृदय घबड़ाने लगा–कि आज तीस वर्षों से निरंतर नमस्कार करता था, कहीं भगवान नाराज न हो जाएं! और मैं भी कहां के चक्कर में पड़ गया! किस बात में पड़ गया! और फिर मैंने कहा कि कौन देखता है! और आपको पता भी क्या चलेगा कि मैंने किया कि नहीं! मैं वापस लौटा, मैंने धीरे से नमस्कार किया, और फिर दफ्तर चला गया–निश्चिंत, शांत होकर। मैंने उनसे कहाः मैंने कभी कहा नहीं कि तुम छोड़ देना नमस्कार करना। मैंने तो यह कहा कि तुम समझ लेना कि यह नमस्कार करना है क्या। और अगर यह ख्याल में आ जाएगा, तो तुम्हें पता भी नहीं चलेगा कि यह कब छूट गया है। यह इस भांति हमारा जो चित्त है, उसको हम समझ रहे हैं कि यह ज्ञान और धर्म को जान लिए वाला चित्त है। इसने कुछ भी नहीं जाना हुआ है। इसी भांति हमने शब्द सीख लिए, शास्त्र सीख लिए, मंदिर सीख लिए, प्रार्थनाएं, पूजाएं सीख लीं–सारी झूठी। इनका हमारे प्राणों के अंतस से कोई संबंध नहीं है। इसका हमारी आत्मा से कोई संबंध नहीं है। और इसीलिए तो हम झूठे आदमी की तरह जमीन पर खड़े हुए हैं। तो पहली बातः शब्द से, शास्त्र से, ज्ञान से, जो सिखाया गया है उससे, उसके प्रति यह बोध जग जाना चाहिए, वह ज्ञान नहीं है, वह सत्य नहीं है, वह केवल शिक्षा है–उधार, बासी, दूसरों की। उसमें मेरा अपना कुछ भी नहीं है। और अगर यह स्मरण आ जाए कि उसमें मेरा अपना कुछ भी नहीं है, तो दीवालें गिर जाएंगी, वह भवन गिर जाएगा। और तब नये भवन को खड़े करने की जगह खाली हो जाएगी। मैं नहीं जानता हूं, यह जानना पहला सूत्र है। मैं नहीं जानता हूं सत्य को, स्वयं को, सर्व को, कुछ भी नहीं जानता हूं। टोटल इग्नोरेंस है, पूरा अज्ञान है, कुछ भी नहीं जानता हूं, यह बोध पहली सीढ़ी है। फिर इसके बाद कुछ हो सकता है इस बोध के ऊपर। क्योंकि सत्य है यह बोध, निश्चित तथ्य है यह, यह हमारी वास्तविक दशा है, तो यह आधार बन सकता है, फिर इसके ऊपर कुछ भवन खड़ा किया जा सकता है। फिर हम पूछ सकते हैं कि मैं कैसे जानूं? फिर हम पूछ सकते हैं कि मैं क्या करूं कि जानना हो सके? अभी तो नहीं जानता हूं। वेजनर एक बहुत बड़ा संगीतज्ञ हुआ। उसके पास एक युवा संगीतज्ञ आया और वेजनर से बोलाः प्रभावित हुआ हूं तुम्हारी कला से मैं, और तुम्हारे निकट रह कर संगीत सीखना चाहता हूं। वेजनर ने कहाः मित्र, पहले तो कहीं और संगीत नहीं सीखा है? उसने कहाः मैंने सीखा है, पांच वर्षों से अभ्यास करता हूं, इसलिए आपको कठिनाई भी कम होगी मुझे सिखाने में। वेजनर ने कहाः तुम गलती में हो, कठिनाई ज्यादा हो गई। तुमने जो सीखा है, पहले उसे भुलाना पड़ेगा। इसलिए फीस दुगुनी होगी। जो लोग बिल्कुल अनसीखे आते हैं, उनसे जितनी फीस लेता हूं, उससे दुगुनी तुमसे लूंगा। क्योंकि पहली तो मुसीबत यह हो गई कि तुमने जो सीखा है, वह भुलाना होगा, वह अनलर्न करना होगा, उसे साफ करना होगा। क्योंकि इधर हम जो संगीत सिखाते हैं, वह सिखाने वाली चीज नहीं है।  ओशो सुविचार 
आइये इस परम सत्य और सत्ता के बारे में जाने ।कहीं मौका निकल न जाये
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Sunday, August 18, 2019

भगवान कहां हैं ? कहां और कैसे मिलेगा..?


                                          भगवान कहां हैं..? कहां और कैसे मिलेगा ?
                                                 आइये जाने ...!
मेरे प्रिय आत्मन्!
एक छोटी सी कहानी से आने वाले तीन दिनों की चर्चाओं का मैं प्रारंभ करूंगा। एक युवा फकीर सारी पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकला। उसने सारी जमीन घूमी। पहाड़ों और रेगिस्तानों में, गांव और राजधानियों में, दूर-दूर के देशों में वह भटका और घूमा। और फिर सारे जगत का भ्रमण करके अपने देश वापस लौटा। जब यात्रा पर निकला था, तो जवान था; जब वापस आया, तो बूढ़ा हो चुका था। अपने देश की राजधानी में आने पर उसका बड़ा स्वागत हुआ। उस देश के राजा ने उसके चरण छुए और उससे कहा कि धन्य है हमारा भाग्य कि तुम हमारे बीच पैदा हुए। और तुमने हमारी सुगंध को सारी दुनिया में पहुंचाया। तुम्हारी कीर्ति के साथ हमारी कीर्ति गई। तुम्हारे शब्दों के साथ, हमने जो हजारों वर्षों में संगृहीत किया था, वह लोगों तक पहुंचा। और मैं भी एक प्रतीक्षा किए तुम्हारी राह देख रहा हूं। अनेक बार मेरे मन में यह ख्याल उठा है कि मेरा मित्र और मेरे देश का भाग्य जब सारी दुनिया से घूम कर लौटेगा, तो शायद मेरे लिए कुछ भेंट भी लाए। शायद सारी दुनिया में कुछ उसने खोजा हो जो मेरे काम का हो। तो मैं बड़ी आशा से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं। मेरे लिए क्या लाए हो? वह फकीर और वह राजा बचपन के मित्र थे। वे एक ही स्कूल में पढ़े थे। राजा बड़ा सम्राट हो गया था। उसने अपने राज्य की सीमाएं बहुत बढ़ा ली थीं। और उसका मित्र फकीर भी सारी दुनिया में यश और कीर्ति अर्जित करके लौटा था। करोड़ों-करोड़ों लोगों ने उसे सम्मान दिया था। और दुनिया का कोई कोना न था जहां उसके चरण और उसकी वाणी न पहुंची हो। उस राजा ने कहा कि मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं कि मेरे लिए क्या भेंट लाए हो? वह फकीर बोलाः मैंने भी यह सोचा था कि जरूर घर लौट कर यह बात पूछी जाएगी। और जरूर ही तुम कहोगे कि क्या लाए हो मेरे लिए? और मैंने दुनिया में बहुत सी चीजें देखी हैं और मैंने सोचा कि उन चीजों को मैं ले चलूं। लेकिन हर चीज लाते वक्त मुझे ख्याल आया, यह तो तुम्हारे पास पहले से ही मौजूद होगी। तुम्हारे पास कौन सी चीज की कमी है! तुमने दूर-दूर के देश जीत लिए हैं! तुम्हारे महलों में सारी दुनिया की संपदा आ गई! तुम्हारे पास कौन सी चीज की कमी होगी जो मैं ले चलूं? आखिर मैं थक गया और मुझे कोई चीज ऐसी न मालूम पड़ी जो तुम्हारे महलों में न पहुंच चुकी हो, जिसके तुम मालिक न बन चुके होओ। बहुत सोच कर एक चीज जरूर मैं ले आया हूं। लेकिन अकेले में और एकांत में उस चीज को मैं तुम्हें दूंगा। उस फकीर के पास कुछ दिखाई भी नहीं पड़ता था, एक छोटा सा झोला था, जो उसके कंधे पर लटका था। उसमें क्या हो सकता था? ऐसी कौन सी चीज हो सकती थी जो राजा के पास न हो? क्योंकि फकीर ने खुद ही कहा कि मैं उन सारी चीजों को छोड़ आया हूं जिनका मुझे ख्याल पैदा हुआ कि तुम्हारे पास पहले से होंगी। उस फटे से झोले में क्या हो सकता था? बड़ी उत्सुकता और आकांक्षा से वह राजा उसे अपने महलों में ले गया। सारे लोग जब पीछे छूट गए, उसने उस फकीर से फिर कहा कि निकालें, दिखाएं मुझे, क्या ले आए हैं मेरे लिए? उस फकीर ने जो निकाला, आप भी नहीं सोच सकते कि वह क्या लाया होगा। वह एक बड़ी सस्ती सी, पर बड़ी अनूठी चीज ले आया था। उसने अपने झोले में से जो निकाला, बड़ी साधारण सी चीज थी। एक छोटा सा आईना था, एक छोटा सा दर्पण था चार पैसे का। और उसने उस राजा को वह दर्पण दिया। राजा ने उसे उलट-पलट कर देखा, उसने कहाः क्या? यह दर्पण ले आए हो? उस फकीर ने कहाः यह मुझे सबसे कठिन चीज मालूम पड़ी, जो राजाओं के पास नहीं होती। इसमें तुम खुद को देख सकोगे। और दुनिया में बहुत कम लोग हैं जो खुद को देखने में समर्थ होते हैं। और जिनके पास बहुत कुछ होता है–धन, संपत्ति, यश, वे तो अपने को देखने में और भी असमर्थ हो जाते हैं। तो बहुत खोज कर मैं यह दर्पण ले आया हूं ताकि तुम अपने को देख सको। इस दर्पण को सस्ता मत समझना। ऐसे तो घर-घर में दर्पण होते हैं, लेकिन खुद को देखने में कौन समर्थ हो पाता है? दर्पण में हम अपने को रोज देख लेते हैं, लेकिन क्या कभी हम अपने को देख पाए हैं? तो उस फकीर ने कहा कि यह दर्पण इस याद के लिए तुम्हें दे जाता हूं कि जिस दिन तुम अपने को देखने में समर्थ हो जाओगे, उस दिन ही समझना कि तुम्हें दर्पण उपलब्ध हुआ है। मैं भी सोचता था रास्ते में कि आपके लिए क्या ले चलूं? सोचा कि मैं भी दर्पण खरीद लूं और आपको एक दर्पण भेंट कर दूं। क्योंकि जमीन पर वे लोग कम होते जा रहे हैं जिनके पास दर्पण हो, जो खुद को उसमें देख सकें और पहचान सकें। पर मैंने कहाः पता नहीं, दर्पण किसी काम में आए या न आए! और दर्पण बड़ी कमजोर चीज है। पता नहीं, आपके हाथों में बचे या टूट जाए! और वह कहानी का भी क्या हुआ अंत में, यह भी अब तक पता नहीं चल सका कि वह राजा अपने को देखने में समर्थ हो पाया या नहीं। इतनी ही कहानी सुनी गई है। इसके बाद क्या हुआ, इसका कोई भी पता नहीं–कि उस दर्पण का क्या हुआ? उस राजा का क्या हुआ? तो मैं अगर दर्पण ले भी आऊं, तो उस दर्पण का क्या होगा, इसका कोई पता नहीं था। इसलिए फिर मैंने सोचा कि तीन दिन में वे बातें करूंगा, जिनसे आपके चित्त में एक दर्पण बन जाए और आप अपने को देखने में समर्थ हो सकें। तो आने वाले तीन दिनों में, आपके चित्त को दर्पण कैसे बनाया जा सके, उस संबंध में कुछ बातें कहूंगा। और आपका चित्त दर्पण बन जाए, तो वह दर्पण न तो फूट सकता है, न टूट सकता है। और वह दर्पण चार पैसे में किसी बाजार में भी नहीं मिल सकता। चार लाख में भी नहीं, चार करोड़ में भी नहीं। कितनी भी संपदा देकर उसे किसी बाजार से खरीदने का कोई उपाय नहीं। वह तो जब खुद को ही कोई निखारता है, खुद के ही जीवन को जब कोई घिसता है और खुद के ही पत्थर जैसे मन को जब कोई चमकाता है, तो वह दर्पण उपलब्ध होता है जिसमें खुद की छवि बनती है। और बड़े रहस्यों का रहस्य यह है कि जो खुद को जानने में समर्थ हो जाता है, वह परमात्मा को भी जान लेता है। और जो खुद को जानने में समर्थ नहीं होता, वह चाहे कुछ भी जान ले, उसके जानने का दो कौड़ी से ज्यादा कोई मूल्य नहीं है। क्योंकि जिसके भीतर अज्ञान हो, उसके बाहर के ज्ञान का क्या अर्थ हो सकता है? जिसके भीतर का दीया बुझा हो, उसके घर के बाहर सूरज भी जल रहा हो, तो उसका क्या प्रयोजन है? जिसकी अपनी आंखें फूटी हों और बंद हों, रास्तों पर कितनी ही रोशनी हो, उस रोशनी से क्या होगा? लेकिन अगर भीतर दीया जल जाए, और रास्ते अंधकार से भरे हों, अमावस की रात से भरे हों, तो भी वह रास्ते का कोई खतरा नहीं है, उस अंधकार का कोई डर नहीं है। एक छोटा सा दीया भीतर हो, तो जहां भी हम कदम रखेंगे वहां प्रकाश हो जाएगा, अंधेरा रास्ता प्रकाशित हो उठेगा और हम उस रास्ते को पार कर सकेंगे। और बाहर के जगत में चाहे कितना ही अज्ञान हो, भीतर अगर ज्ञान की एक किरण भी फूट जाए, तो इस दुनिया भर का अज्ञान भी उस एक किरण के सामने बहुत कमजोर होता है। और भीतर अगर दर्पण मिल जाए, तो हम खुद को तो देख ही पाएंगे और उस खुद के देखने में हम यह भी जान पाएंगे कि उस खुद में ही वह भी छिपा था जो खुदा है, स्वयं में वह भी छिपा था जो सत्य है, स्वयं में वह भी मौजूद था जो कि भगवान है। और स्वयं में खोजे बिना चाहे हम किन्हीं मंदिरों की पूजा करें और किन्हीं मस्जिदों में प्रार्थनाएं पढ़ें और किन्हीं शिवालयों में जाकर हम दीये जलाएं, न कोई शिवालय है और न कोई मस्जिद और न कोई मंदिर काम का आएगा, क्योंकि मंदिर तो एक है जो मनुष्य के भीतर है। पत्थर और ईंटों के मंदिरों ने मनुष्य को परमात्मा से जोड़ा नहीं बल्कि तोड़ा है। मंदिर और मस्जिद दुश्मन की भांति खड़े हो गए हैं। मस्जिद और मंदिर में जाने वाले लोग एक-दूसरे के शत्रु होकर खड़े हो गए हैं। भगवान क्या किसी के बीच शत्रुता बन सकता है? परमात्मा क्या मनुष्य और मनुष्य को तोड़ने के लिए दीवाल बन सकता है? परमात्मा क्या कोई सीमा बन सकता है जो एक को दूसरे से अलग कर दे? निश्चित ही जो मंदिर और मस्जिद मनुष्य को मनुष्य से अलग करते हों, वे झूठे होंगे, पत्थरों से बनाए गए होंगे, उनमें बैठे हुए भगवान भी पत्थर से ज्यादा नहीं हो सकते हैं। लेकिन एक और मंदिर भी है, जो मन का है। और वह जो मन का मंदिर है, वह न हिंदू का है, और न मुसलमान का है, और न ईसाई का, और न जैन का। क्योंकि मन तो मन है, न वह हिंदू होता है, न मुसलमान और न ईसाई। उस मन के मंदिर को अगर कोई उपलब्ध हो जाए, खोज कर ले, तो उसी में वह प्रभु को भी पा लेगा। तो उस दर्पण की हम चर्चा करेंगे इन तीन दिनों में। और वह खुद के भीतर दर्पण कैसे विकसित हो जाए? कैसे हम उसको दर्पण को निर्मित कर लें और उस दर्पण में अपने को पा लें? क्योंकि जो मनुष्य अपने को भी नहीं पा सका है, वह और क्या पा सकेगा? और खुद को छोड़ कर चाहे वह सारे जगत का साम्राज्य भी पा ले, तो भी आखिर में पाएगा–उसके हाथ खाली के खाली हैं। सिकंदर जिस दिन मरा, उस दिन जिस राजधानी में उसकी अरथी निकली, लोग हैरान हो गए। एक ही बात उस दिन उस राजधानी में राजपथ पर गूंजने लगी, हजार-हजार ओंठों पर, हजार-हजार मुंह से एक ही बात पूछी जाने लगी कि यह क्या है? सिकंदर के दोनों हाथ अरथी के बाहर लटके हुए थे! ऐसी अरथी कभी भी नहीं निकली थी। लोग पूछने लगे कि क्या कोई भूल हो गई है? अरथी के बाहर दोनों हाथ क्यों लटके हुए हैं? हाथ तो अरथी के भीतर होते हैं। धीरे-धीरे लोगों को पता चला, सिकंदर ने मरने के पहले कहा थाः मेरे हाथ अरथी के बाहर रखे जाएं, ताकि लोग देख लें, मैं भी खाली हाथ दुनिया से जा रहा हूं। मैंने बहुत कुछ जीता, जमीन करीब-करीब जीत ली थी। और जो भी ज्ञात था, वह सब मेरा साम्राज्य हो गया था। लेकिन मरते वक्त मैं अनुभव करता हूं कि मुझसे ज्यादा दरिद्र आदमी और कोई नहीं है। और दुनिया यह बात देख ले कि एक सम्राट भी खाली हाथ मरता है। इसलिए मेरे हाथों को अरथी के बाहर खुले लटके रहने देना। हम सबके हाथ भी खाली ही जाते हैं। और खाली जाएंगे ही। क्योंकि एक ही संपदा है जो प्राणों को भर सकती है, और वह हमारे भीतर है। और बाहर जो भी संपदा है, उसके हम भ्रम में रहें भला कि उसे इकट्ठा करके हम अपने प्राणों को भर लेंगे, परिपूरित कर लेंगे, फुलफिलमेंट हो जाएगा, लेकिन आज तक यह न हुआ है और न होगा। आप भी उसके अपवाद नहीं हो सकते हैं। जीवन का नियम यही हैः जो बाहर है, वह भरने का भ्रम देता है, लेकिन भर नहीं पाता। और जो भीतर है, वही केवल भर सकता है। और उसे लाने को भी कहीं जाना नहीं, कोई यात्रा नहीं करनी, कोई युद्ध नहीं करना, कोई आक्रमण नहीं करना, केवल आंखें फेरनी हैं और भीतर खोज लेना है। वह दर्पण मिल जाए भीतर का, तो यह खोज पूरी हो सकती है। हममें से सारे लोग ही शायद उसकी खोज में हैं। हममें से शायद ही कोई व्यक्ति हो, जो दुखी, पीड़ित और अशांत नहीं है। हममें से शायद ही कोई हो, जो खाली-खाली अनुभव नहीं करता। हममें से शायद ही कोई हो, जिसे यह अहसास नहीं होता कि मेरा जीवन पानी पर खींची हुई लकीरों की भांति रोज मिटा जा रहा है और मेरे हाथों में कुछ भी उपलब्धि नहीं है। कोई पाना नहीं है, मैं खाली और रिक्त जी रहा हूं और मरा जा रहा हूं। यह जो अहसास है खाली और रिक्त होने का, यह जो एंप्टीनेस है सारी दुनिया में, हर आदमी को अनुभव हो रही है, इस अनुभव को भरने के वह उपाय करता है। लेकिन वे उपाय भी अगर बाहर ही हों, तो उन उपायों से भी कुछ भी नहीं हो पाता। जब हम पीड़ित और परेशान होते हैं, तो हम भगवान की तलाश में निकलते हैं। मंदिरों में, मस्जिदों में खोजते हैं उसे। पहाड़ों पर, तीर्थों में खोजने जाते हैं उसे। दूर की यात्राएं करते हैं उसके लिए। लेकिन एक बात भूल जाते हैं कि हमारे भीतर जो प्राणों का प्राण बैठा है, क्या कभी उसको भी खोजेंगे? क्या कभी उसको भी पहचानेंगे? इसके पहले कि कोई किसी और खोज में जाए, जिसके पास भी थोड़ी समझ और बोध है, उसे अपनी खोज कर लेनी चाहिए। हो सकता है जिसे हम खोजना चाहते हों, वह हमारे भीतर मौजूद हो। और हो सकता है कि जहां हम उसे खोजने जा रहे हैं, वहां वह बिल्कुल ही मौजूद न हो। एक अंधेरी रात में, एक चर्च पर, एक नीग्रो ने जाकर द्वार खटखटाया। चर्च के पादरी ने द्वार खोला। काश, उसे पता होता कि एक काला आदमी द्वार बजा रहा है, तो वह द्वार भी न खोलता। क्योंकि वह चर्च जो था सफेद चमड़ी के लोगों का चर्च था। अब तक जमीन पर आदमी ऐसा मंदिर नहीं बना पाया जो सबका हो। और जो मंदिर सबका नहीं है वह परमात्मा का कैसे हो सकेगा? सफेद चमड़ी के लोगों के मंदिर हैं, काली चमड़ी के लोगों के मंदिर हैं; हिंदुओं के मंदिर हैं, मुसलमानों के मंदिर हैं; जैनों के मंदिर हैं, बौद्धों के मंदिर हैं; ब्राह्मणों के मंदिर हैं, शूद्रों के मंदिर हैं; लेकिन मनुष्य का कोई मंदिर नहीं। वह मंदिर भी मनुष्य का नहीं था। दरवाजा खोल दिया तो देखा कि एक नीग्रो खड़ा है, काला आदमी। पुराने दिन होते तो उसने कहा होताः हट शूद्र यहां से, भगवान के मंदिर में तेरे लिए कोई जगह नहीं है! और पुराने दिन होते तो शायद उसकी गर्दन कटवा देता, या उसके कानों में शीशा पिघलवा कर भरवा देता कि तू इस मंदिर के आस-पास क्यों आया! लेकिन जमाना बदल गया है, तो उस चर्च के पादरी को उसे प्रेम से समझा कर लौटा देना पड़ा। उसने उस नीग्रो को कहाः मेरे मित्र, किसलिए मंदिर में आना चाहते हो? उसने कहाः मन है मेरा दुखी, चित्त है मेरा पीड़ित और चिंताओं से भरा। शांत होना चाहता हूं। जीवन बीत गया मालूम होता है और कुछ भी मैंने पाया नहीं। भगवान की शरण चाहता हूं। यह एक ही मंदिर है गांव में, मुझे भीतर आने दो, भगवान का सान्निध्य मिलने दो। उस पादरी ने कहाः मित्र, जरूर आने दूंगा। लेकिन जब तक मन शुद्ध न हो, चित्त पवित्र न हो, प्राण शांत न हों, आत्मा ज्योति से न भर जाए, तब तक भगवान से मिलना नहीं हो सकेगा। आकर भी क्या करोगे? जाओ और पहले अपने मन को शुद्ध करो और शांत करो, हृदय को प्रार्थना और प्रेम से भरो, फिर आना। फिर मैं तुम्हें भीतर प्रवेश दूंगा। वह नीग्रो वापस लौट गया। उस पादरी ने सोचाः न होगा कभी इसका मन शांत और न यह दुबारा कभी आएगा। लेकिन कोई दो-तीन महीने बीत जाने के बाद एक दिन बाजार में उस पादरी ने देखा कि वह नीग्रो चला जा रहा है। लेकिन वह तो आदमी दूसरा हो गया मालूम पड़ता है। उसकी आंखों में कोई नई रोशनी, कोई नई झलक। उसके पैरों की चाल बदल गई है, उसके चारों तरफ कोई वायुमंडल ही और हो गया है, उसके ओंठों पर कोई और ही मुस्कुराहट है जो इस जमीन की नहीं है। तो उसने उस नीग्रो को पूछा और कहा कि तुम वापस नहीं आए? वह नीग्रो हंसने लगा और उसने कहाः मैं तो आना चाहता था। और उसी आने के लिए मैंने प्रार्थनाएं कीं, उसी आने के लिए मैंने भगवान से न मालूम कितनी मनौतियां मानीं, उसी आने के लिए मैंने अपने मन को सब भांति शांत किया। लेकिन मैं क्या करता, खुद भगवान ने मुझे रोक दिया कि मत जाओ। एक रात जब मैं प्रार्थनाएं करके सो गया, तो मैंने सपना देखा कि भगवान खड़े हैं। और वे मुझसे पूछ रहे हैं कि क्यों तू मुझे पुकार रहा है? क्यों तू मुझे बुला रहा है? तो मैंने कहा कि वह जो हमारे गांव का मंदिर है, चर्च है, मैं उसमें प्रवेश पाना चाहता हूं, इसी के लिए सारी प्रार्थनाएं कर रहा हूं। तो भगवान हंसने लगे और उन्होंने कहाः तू बड़ा पागल है! यह ख्याल छोड़ दे। दस साल से मैं खुद उस चर्च में घुसने की कोशिश कर रहा हूं, वह पादरी मुझे भी नहीं घुसने देता! तू यह ख्याल छोड़ दे। और सच्चाई तो यह है कि उस मंदिर में ही नहीं, आज तक किसी मंदिर में किसी पुरोहित ने भगवान को प्रवेश नहीं पाने दिया। आज तक जमीन पर कोई मंदिर भगवान का घर नहीं बन सका। कई कारण हैं न बनने के। पहली बात, भगवान प्रेम है और हमारे सब मंदिर व्यवसाय हैं। प्रेम का और व्यवसाय से क्या संबंध हो सकता है? जहां व्यवसाय है, वहां प्रेम का कोई प्रवेश नहीं। दूसरी बात, सब मंदिर आदमी के बनाए हुए हैं। भगवान आदमी का बनाया हुआ नहीं है। आदमी की बनाई हुई चीज में भगवान का प्रवेश असंभव है। तीसरी बात, आदमी जो भी बनाएगा, आदमी से छोटा होगा। बनाने वाले से बनाई गई चीज बड़ी नहीं हो सकती। स्रष्टा से बड़ी उसकी सृष्टि नहीं हो सकती। आदमी खुद ही बहुत छोटा और क्षुद्र है, उसके बनाए हुए मंदिर और भी छोटे और क्षुद्र हैं। और परमात्मा है विराट, असीम। इन क्षुद्र घेरों में और दीवालों में उसका आगमन कैसे हो सकता है? आज तक नहीं हुआ, आगे भी नहीं होगा। लेकिन जिन लोगों को यह ख्याल पैदा होता है कि हम सत्य की खोज करें, वे किन्हीं मंदिरों में उस खोज को करने लगते हैं। इससे बड़ी भूल और कोई दूसरी नहीं हो सकती। सत्य की खोज करनी हो, तो खुद को मंदिर बनाना होगा, इसके सिवाय और कोई रास्ता नहीं है। कोई जमीन पर मंदिर नहीं है जहां सत्य की खोज हो सके। हां, हर आदमी खुद मंदिर बन सकता है, जहां भगवान का प्रवेश हो सके। और यह खुद आदमी मंदिर कैसे बन जाए? चित्त दर्पण बन जाए तो आदमी मंदिर बन सकता है। चित्त दर्पण बन जाए तो आदमी इसलिए मंदिर बन सकता है कि उसी दर्पण में भगवान की छवि उतरनी शुरू हो जाती है। एक बार ऐसा हुआ, एक अरबी बादशाह के दरबार में कुछ यूनानी चित्रकार आए। और उन चित्रकारों ने कहाः हम अपनी कला का प्रदर्शन करना चाहते हैं। लेकिन अरबी बादशाह के दरबार में अरब के बड़े-बड़े चित्रकार थे, उन्हें बड़ी इस बात से प्रतिस्पर्धा पैदा हुई और उन्होंने कहाः कोई हमारी कला कम है जो इन चित्रकारों को आमंत्रण दिया गया है? अगर ये कुछ प्रदर्शन करना चाहते हैं, तो हम भी कुछ प्रदर्शन करना चाहते हैं। दोनों चित्रकारों की मंडलियों को, यूनानी और अरबियों को एक बड़ा भवन दे दिया गया कि वे अपनी-अपनी कला का प्रदर्शन करें। अरबी चित्रकारों ने बड़ी अदभुत दीवालों पर चित्रकारी की, बड़े खूबसूरत चित्र बनाए। छह महीने तक निरंतर वे दिन-रात श्रम करते रहे और उन्होंने एक पूरी दीवाल पर जादू खड़ा कर दिया। उनकी मेहनत तो देखने जैसी थी, उनका श्रम तो अदभुत था। लेकिन और भी बड़े आश्चर्य की बात तो यह थी कि यूनानी चित्रकार कुछ भी नहीं कर रहे थे। न उनके पास तूलिकाएं थीं और न रंग था। और राजा ने बहुत बार उनको कहा कि तुम्हें कोई जरूरत हो, तो उन्होंने कहाः हमें कोई भी जरूरत नहीं। उन्होंने अपनी दीवाल पर एक पर्दा लटका लिया था। दोनों दीवालें आमने-सामने थीं। उन्होंने अपनी दीवाल पर एक पर्दा लटका लिया था। अरबी चित्रकार दीवाल पर पागल की भांति मेहनत कर रहे थे और दीवाल को एक अदभुत चित्र में निर्मित कर दिया था। ये यूनानी चित्रकार क्या कर रहे थे? वे अपने पर्दे के पीछे क्या करते थे? न तो वे कभी रंग ले जाते दिखाई पड़े, न कभी तूलिकाएं, लेकिन वे भी दिन-रात भीतर लगे थे, क्या कर रहे थे? सारे नगर में चर्चा थी, उत्सुकता थी। छह महीने पूरे हों, तो लोग देखें। छह महीने पूरे हुए, राजा गया। राजा भी दीवाना था जानने को कि वे क्या कर रहे हैं? वे जब कोई सामान नहीं ले जाते, तो क्या करते होंगे? अंतिम दिन आ गया और राजा गया। अरबी चित्रकारों की चित्रकला देखने जैसी थी। दंग हो गए लोग देख कर। इतने सजीव चित्र उन्होंने बनाए थे, जैसे वे दीवाल से बाहर निकल आएंगे। ऐसे सजीव वृक्ष उन्होंने दीवाल पर पेंट किए थे कि भूल हो जाए कि वे असली हैं या नकली। दीवाल पर ऐसे रास्ते थे कि मन होने लगे कि उन पर चल पड़ो। बहुत अदभुत था। राजा बहुत प्रसन्न हुआ और उसने कहाः मेरी कल्पना भी न थी कि मेरे दरबार में ऐसे चित्रकार हैं! मुझे ख्याल भी न था कि इतनी बड़ी कला, इतनी क्षमता तुममें है! और फिर वह मुड़ा दूसरी दीवाल की तरफ और उसने यूनानी चित्रकारों को कहाः हटाओ अपना पर्दा। तुमने तो हमारी नींद तक मुश्किल कर दी है, रात में भी सपना आता है कि तुम क्या कर रहे हो आखिर? उन्होंने पर्दा हटा दिया और लोग देख कर हैरान रह गए। जो चित्र अरबी चित्रकारों ने बनाया था, वही चित्र और भी अदभुत रूप में सामने की दीवाल पर मौजूद था! यूनानी चित्रकारों ने कोई चित्र नहीं बनाया, वे तो केवल दीवाल को घिस कर दर्पण बनाते रहे। उन्होंने सारी दीवाल घिस डाली थी। छह महीने में उन्होंने दीवाल को दर्पण बना दिया था। अरबी चित्रकारों का चित्र अदभुत था, अदभुत थी उनकी कला, लेकिन दर्पण में वही चित्र और हजार गुना सुंदर होकर दिखाई पड़ने लगा था। वे यूनानी चित्रकार बोलेः हम तो केवल दर्पण बनाना जानते हैं। चित्र तो परमात्मा ने बना दिए हैं, हम दर्पण बना देते हैं। और परमात्मा और हजार गुना खूबसूरत होकर उन दर्पणों में झलक आता है। परमात्मा तो सब तरफ मौजूद है, हमारे पास दर्पण चाहिए, और दर्पण हो तो वह दिखाई पड़ेगा। और वह दिखाई पड़ेगा, तो हम सब उसके मंदिर हो जाएंगे। और जब कोई आदमी उसका मंदिर हो जाता है, तभी उसके जीवन में आता है आनंद, तभी उसके जीवन में आता है सौंदर्य, तभी उसके जीवन में पैदा होता है संगीत, तभी उसके जीवन में कोई नई क्रांति घटित हो जाती है, वह कुछ से कुछ और हो जाता है। तो इन आने वाले तीन दिनों में, कैसे हम दर्पण बन जाएं, कैसे हम मंदिर बन जाएं, उसकी हम बात करेंगे। मैं बात करूंगा, लेकिन मेरी बात करने से आप मंदिर बन नहीं सकते। मेरी बात करने से अगर आप दर्पण बन सकते होते, तब तो बड़ी आसान बात थी। मैं बात करूंगा, वह बात अगर आपके हृदय में किसी कोने में पहुंच जाए, अगर आप अपने हृदय में दरवाजा खोलें और उसको भीतर जाने दें, तो वह आपके भीतर बीज बन सकती है। और वह बीज आपके भीतर विकसित हो सकता है। लेकिन वह विकास करना होगा आपको, वह बदलाहट करनी होगी आपको। इतना जरूर मैं कह सकता हूं कि वह बदलाहट कठिन नहीं है, बहुत आसान है, बहुत सरल है। इसलिए सरल है वह बात कि परमात्मा को पाने से ज्यादा सरल और क्या बात हो सकती है? अगर परमात्मा को पाना ही कठिन हो गया, तो फिर तो और सब बातें और कठिन हो जाएंगी। क्योंकि परमात्मा है सब जगह उपलब्ध और सबके भीतर मौजूद। असलियत तो यह है कि परमात्मा को खोना असंभव है। क्योंकि परमात्मा का अर्थ ही यह है कि जिसमें हम जी रहे हैं, जो हमारा जीवन है, जो हमारी श्वास-श्वास और हमारा प्राण-प्राण है, उसे हम खो कैसे सकते हैं? जैसे मछली सागर को नहीं खो सकती, सागर में होना ही उसका जीवन है, उसकी आत्मा है, ऐसे ही हम भी परमात्मा को नहीं खो सकते। लेकिन जो परमात्मा निरंतर हमें उपलब्ध है, उसका भी हमें स्मरण नहीं और बोध नहीं। वह बोध थोड़ी ही सरलता से उपलब्ध हो सकता है। वह थोड़े ही सहज और स्वाभाविक होने से उपलब्ध हो सकता है। बड़ी सरल है बात। लेकिन सरल बात भी कभी-कभी बहुत कठिन मालूम होती है। क्योंकि हम उस सरल बात के विरोध में इतने दूर तक चले गए होते हैं कि लौटना कठिन हो जाता है। हम इतने दूर चले गए होते हैं किसी सरल बात के विरोध में कि लौटना कठिन हो जाता है। एक आदमी पेकिंग के बाहर कोई तीन-चार मील की दूरी पर रास्ते पर चला जाता था और उसने एक छोटे से बच्चे से पूछाः पेकिंग कितनी दूर है? उस लड़के ने कहाः जिस तरफ आप जा रहे हैं, अगर उसी तरफ आप चलते चले जाएं, तो इस जिंदगी में पेकिंग पहुंचना कठिन है। लेकिन अगर आप कृपा करें और लौट पड़ें, तो चार मील से ज्यादा फासला नहीं है। वह जिस तरफ चला जा रहा था, अगर वह उसी तरफ चलता चला जाए, तो पूरी जमीन का चक्कर लगाए, तब पेकिंग पर पहुंच सकता था। लेकिन अगर लौट पड़े, तो चार मील का फासला था, जो कोई फासला नहीं था। हम जिस तरफ चले जा रहे हैं, वह परमात्मा की बिल्कुल विरोधी दिशा है, वह शांति की विरोधी दिशा है, वह सत्य की विरोधी दिशा है। अगर हम उस पर ही चले जाएं, तो पेकिंग तो कोई पहुंच भी सकता है पूरे जमीन का चक्कर लगा कर, क्योंकि कोई जमीन बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन जिस रास्ते पर हम चलते हैं जीवन के, वह अनंत है। और हम चलते चले जाएं तो परमात्मा से दूरी निरंतर बढ़ती चली जाती है। लेकिन यदि हम लौटने का साहस करें, तो शायद हम लौटें और परमात्मा मौजूद है। जैसे कोई सूरज की तरफ पीठ किए खड़ा हो और पूछे कि सूरज कहां है? मैं कैसे पहुंचूं? तो हम उससे कहेंगेः कहीं पहुंचना नहीं है, केवल तू पीठ फेर ले और आंखें उस तरफ ले आ जिस तरफ तू पीठ किए है, तो सूरज तेरी आंखों के सामने आ जाएगा। शायद पीठ फेरने की बात है और हम परमात्मा के सामने आ सकते हैं। तो कैसे यह पीठ फेरेंगे, उसकी बात तो कल सुबह से आपसे करूंगा। यह तो प्राथमिक चर्चा है थोड़ी सी, आपको सिर्फ यह ख्याल दिलाने को कि हम तीन दिनों में क्या करने वाले हैं। एक निवेदन हैः जो भी व्यक्ति उत्सुक हो, वह पूरे-पूरे तीन दिन आए, नहीं तो बिल्कुल न आए। जो भी उत्सुक हो, वह कल सुबह से आए तो फिर पूरे तीन दिन आए, नहीं तो कल सुबह से न आए। कोई भीड़ करने की यहां जरूरत नहीं है। आना हो तो पूरे तीन दिन आने का ख्याल हो तो आना चाहिए, नहीं तो नहीं आना चाहिए। क्योंकि अधूरी बातें सुनना कभी-कभी न सुनने से भी ज्यादा खतरनाक हो जाता है। आधी बातें सुनना न सुनने से भी ज्यादा खतरनाक हो जाता है। अधूरा ज्ञान अज्ञान से भी ज्यादा खतरनाक हो जाता है। इसलिए पहला निवेदन तो यह है कि आज की बात की तो कोई फिकर नहीं, लेकिन कल सुबह से आना है तो फिर पूरे दिन, पूरे वक्त, पूरी चर्चाओं में मौजूद होना हो तो ही आना है, नहीं तो नहीं आना है। दूसरी बात, कोई भी जो बातें मैं कहूंगा इन तीन दिनों में, उन पर निर्णय लेने की, जजमेंट करने की जल्दी मत करना, जब तक कि मेरी पूरी बात न सुन लें। तो निर्णय को थोड़ा स्थगित रखना। जब मेरी तीन दिन की पूरी बात सुन लें, तब सोचना और विचार करना। मेरी एक-एक बात पर अगर विचार करना शुरू किया, तो समझना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि हो सकता है कि जो मैं कहूं वह शुरू-शुरू में अटपटा मालूम पड़े। लेकिन अगर तीन दिन पूरी बात को समझने की कोशिश की, तो हो सकता है उसका अटपटापन चला जाए और तीन दिन में पूरी बात ख्याल में आ जाए। तो जल्दी निर्णय करने की कोशिश मत करना। जीवन और जीवन के सत्य इतने रहस्यपूर्ण हैं और हमारी समझ इतनी छोटी कि जब हम उससे निर्णय कर लेते हैं, तो हम अक्सर भूल में पड़ जाते हैं। तो जल्दी निर्णय नहीं करेंगे, दूसरा निवेदन। रोज-रोज फुटकर निर्णय नहीं करेंगे, एक-एक बात पर नहीं सोचेंगे। पूरी बात मेरी सुन लेंगे तीन दिन। फिर सोचने का काफी वक्त होगा। फिर धीरे-धीरे उस पर सोचना। हमारी आदतें गलत हैं। इधर मैं बोलता हूं, उधर आप सोचना जारी रखते हैं कि यह जो मैं कह रहा हूं, ठीक है या गलत? यह जो मैं कह रहा हूं, यह गीता में लिखा है या नहीं? यह जो मैं कह रहा हूं, यह क्राइस्ट ने कहा या नहीं? महावीर ने यही कहा या नहीं? जब मैं बोलता हूं, उसी वक्त अगर आप सोचते हैं, तो आपको पता है, मन एक समय में एक ही काम कर सकता है, या तो सुन सकता है या सोच सकता है। तो अगर आप उसी वक्त सोचते हैं, तो आप सुन न पाएंगे। और जिस बात को आप सुन ही न पाएंगे, उसको सोच कैसे पाएंगे? तो पहले सुन लेना, सोचना बाद में कर लेना। कोई जल्दी नहीं है। और मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि सुनने का मतलब मान लेना। नहीं। सुनने का मतलब यह भी नहीं है कि मैं जो कहूं उसे मान लेना। मान लेने की भी जल्दी मत करना। क्योंकि मान लेना भी एक निर्णय है। सुनना सिर्फ, न मानने की जल्दी, न न मानने की जल्दी; न स्वीकार, न अस्वीकार, सिर्फ चुपचाप मौन से सुन लेना काफी है। और अगर तीन दिन मौन से बात को सुना भी, तो सुनते-सुनते ही, अगर उस बात में कोई सच्चाई है, तो वह आपके प्राणों तक पहुंच जाएगी। और अगर वह बात गलत है, तो उसके गलत होने का भी स्पष्ट बोध आपको हो जाएगा। एक फकीर एक गांव में नया-नया पहुंचा था। उस गांव के लोगों ने कहा कि चलो, शुक्रवार का दिन था और मस्जिद में नमाज का दिन था, तो उन गांव के लोगों ने कहा कि आओ और मस्जिद में आज हमें समझाओ कुछ। वह गया। वह मंच पर बैठा और उसने कहाः मेरे मित्रो, इसके पहले कि मैं बोलना शुरू करूं, मेरी एक खराब आदत है, मैं एक प्रश्न पूछता हूं हमेशा। वह प्रश्न मैं आज भी पूछूंगा। और तुम सबको उसका उत्तर देना पड़ेगा। और उस फकीर ने पूछाः मैं यह पूछना चाहता हूं कि मैं जिस संबंध में बोलूंगा, आप लोग उस संबंध में कुछ जानते हैं या नहीं? उन सारे लोगों ने कहाः हम कुछ भी नहीं जानते, हमें कुछ भी पता नहीं है। वह फकीर मंच से नीचे उतर गया और उसने कहा कि क्षमा करें, फिर मैं न बोल सकूंगा। क्योंकि जो लोग कुछ भी नहीं जानते, उनके साथ सिर खपाना फिजूल है, बेकार है। लोग बड़ी हैरानी में पड़ गए! वह फकीर उठ कर चला गया। फिर दूसरा शुक्रवार आया, उस गांव के लोगों ने कहाः बड़ा अजीब फकीर है। अब फिर उसके पास चलें। वे फिर गए और उन्होंने कहा कि चलो, शुक्रवार का दिन आ गया, उपदेश करो। वह फकीर फिर राजी हो गया और आ गया। मंच पर बैठा और उसने कहाः जैसी मेरी खराब आदत है, मैं एक प्रश्न बिना पूछे कभी अपनी बात शुरू नहीं करता। और तुम सबको उत्तर देना पड़ेगा। लोग तैयार थे लेकिन। पिछली बार भूल हो गई थी। उसने कहा कि मैं पूछना चाहता हूं कि मैं जिस संबंध में बोलूंगा, आपको उस संबंध में कुछ पता है या नहीं? सारे लोगों ने कहाः हमको पता है। पिछली दफा भूल हो गई थी यह कह कर कि नहीं पता है। वह फकीर नीचे उतर गया और उसने कहाः जिनको सब कुछ पता है, उनके साथ सिर पचाना फिजूल है। मैं वापस जाता हूं। अब तो लोग बड़ी मुश्किल में पड़ गए। लेकिन तीसरा शुक्रवार आ गया। और उन्होंने कहाः एक मौका और लेना चाहिए। यह आदमी है कैसा? वे गए और उन्होंने उस फकीर से कहा कि चलें, शुक्रवार का दिन आ गया, उपदेश करें। वह फिर राजी हो गया। वह वापस आकर मंच पर बैठा, उसने कहाः जैसी कि मेरी सदा की आदत है, एक प्रश्न बिना पूछे मैं कभी चर्चा शुरू नहीं करता। लोग तैयार थे। उसने पूछा कि यह जो मैं बोलने वाला हूं, उस संबंध में कुछ पता है या नहीं? तो लोगों ने कहाः कुछ लोगों को पता है और कुछ लोगों को पता नहीं है। वह फकीर नीचे उतर कर खड़ा हो गया और उसने कहाः फिर जिनको पता है, वे उनको बता दें जिनको पता नहीं है। मैं जाता हूं। मेरी यहां क्या जरूरत है? चौथा शुक्रवार भी आ गया, लेकिन चौथा कोई उत्तर नहीं था लोगों के पास। वह फिर वही बात पूछेगा, अब क्या करेंगे? तीन ऑल्टरनेटिव, तीन विकल्प हो सकते थे। तीनों खत्म हो गए थे। चौथा कोई विकल्प नहीं था। अब इस फकीर के साथ झंझट हो गई थी। अब क्या करें उस गांव के लोग? समझ लीजिए वह फकीर मैं ही हूं और आप ही उस गांव के लोग हैं, क्या करिएगा? तीन विकल्प के अलावा चौथा विकल्प है? तीन उत्तर के अलावा चौथा उत्तर है? उस गांव में उस फकीर का प्रवचन न हो सका, क्योंकि गांव के लोग चौथा उत्तर देने में समर्थ नहीं हो सके। चौथा उत्तर लेकिन है। चौथा उत्तर यह था कि उन्हें कोई भी उत्तर नहीं देना था, उन्हें चुप रह जाना था। वह फकीर जरूर बोलता। उन्हें मौन रह जाना था। उन्हें कोई बात नहीं कहनी थी। उन्हें कोई जल्दी नहीं करनी थी। वे चुप रह जाते, फकीर जरूर बोलता। क्योंकि केवल उन्हीं लोगों के सामने बोला जा सकता है जो चुप हों। जो चुप नहीं हैं, उनके सामने कुछ भी नहीं बोला जा सकता। तो यही प्रार्थना आज की संध्या मैं आपसे करूंगा कि इन तीन दिनों में आंतरिक रूप से थोड़ा सा चुप और मौन होकर, जो मेरे हृदय में कुछ बातें हैं वह मैं आपसे कहूं, तो सुनने की कृपा करना। आज की रात तो इतनी ही बात। चित्त को एक दर्पण बनाना है, ताकि परमात्मा पाया जा सके। चित्त दर्पण बन सकता है। सरल है यह कीमिया, सरल है यह राज चित्त को दर्पण बना लेने का। उसका मेथड, उसकी विधि, उसकी हम बात करेंगे। मैं बात करूंगा, तो जरूरी है कि आप चुप रहें। नहीं तो बात नहीं हो सकेगी। अगर मेरे ऊपर यह जिम्मा है कि मैं तीन दिन कुछ बातें आपसे करूं, तो आप पर यह जिम्मा होगा कि तीन दिन आप चुप होंगे। नहीं तो फिजूल हो जाएगी बात। और जो उस फकीर ने किया, वही फिर मुझे भी करना चाहिए। उतना कठोर मैं नहीं हूं, उतना नहीं कर पाऊंगा। इसलिए बेफिकर रहें। लेकिन आप भी दया करेंगे और कठोर न होंगे। और थोड़ा चुप, मौन, साइलेंस से बातों को सुनने की कोशिश करेंगे, तो शायद वे बातें आपके प्राणों तक पहुंच सकें। जमीन में हम बीज बोते हैं। पथरीली जमीन में बीज भीतर नहीं पहुंच पाता, पत्थर रोक देते हैं। पत्थर न हों, तो बीज भीतर पहुंच जाता है, जड़ें फैला लेता है, अंकुर फूट पड़ता है, पौधा बन जाता है। जो मन बेचैन बातचीत में लगा रहता है अपने भीतर, पत्थर की तरह हो जाता है, उसके भीतर कोई बात नहीं पहुंचती, कोई बीज नहीं पहुंचता, फिर उसमें कोई अंकुर नहीं आता। लेकिन जो मन मौन होता है, शांत होता है, साइलेंस में सुनता और समझता है, वह मन उस जमीन की भांति होता है जिसमें पत्थर नहीं हैं। उसमें बीज भीतर प्रविष्ट हो जाता है, उसकी जड़ें फैल जाती हैं, उसमें अंकुर आ जाते हैं। वह जीवन बदल जाता है। बस इतनी ही थोड़ी सी बात आज की रात कहूंगा।   मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुना, उसके लिए बहुत-बहुत अनुगृहीत हूं। सबके भीतर बैठे हुए परमात्मा को प्रणाम करता हूं। अंत में मेरे प्रणाम स्वीकार करें।ओशो
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Dr.R.R.Mishra 9898630756 Navsari

Friday, August 16, 2019

વિજલપોર નગરપાલિકા માં કરોડોના ખર્ચે બનેલા તળાવ માં પાણી એકટીપુ નથી ...જવાબદાર કૌણ ..?

વિજલપોર નગરપાલિકા સૌથી ઈમાનદાર નગરપાલિકા..! 
 કરોડોના ખર્ચે બનેલા તળાવ માં  એક ટીપુ પાણી નથી ? 
જવાબદાર કૌણ ..?
શાસન,પ્રશાસન કે નાગરિકો ..? 


                  આજે ગુજરાત સરકાર અને ભારત સરકાર જલ સંગ્રહ માટે સમગ્ર દેશ વાસિઓ પાસે એક વિશાળ યોજના સાથે નમ્ર અપીલ કરી રહ્યા છે. દરેક દરેકને પીવા માટે ચોખ્ખુ પાણી મળે એના માટે સરકાર રાત દિવસ મહેનત કરી રહી છે. નાગરિકો પાસે પણ એક મોટી આશા રાખે છે. અને આજે સમ્પૂર્ણ દેશ માં મેઘ લહરથી લોકો ત્રાહિમામ થઈ રહ્યા છે. ગુજરાત માં ખેડુતો સાથે જાહેર જનતા નો મોટો નુકશાન થયેલ છે. પરંતુ ગુજરાત રાજ્યના ઐતિહાસિક અને સંસ્કારી નગરી નવસારી જિલ્લોના વિજલપોર નગરપાલિકાના શાસન અને પ્રશાસનિક અધિકારીઓ ખરેખર એક ઐતિહાસિક ભુમિકા ભજવી રહ્યા છે. જે તસ્વીર માં સ્પષ્ટ નજરે પડી રહ્યો છે. ખરેખર એ કાબીલે તારીફ કામગીરી કહેવાય. આજે પહેલીવાર દેશ માં એક રાજનૈતિક પાર્ટી દેશ જ નહિ પોતાના કામોથી સંપૂર્ણ વિશ્વ માં નામ નોધાવી રહી છે. છેલ્લા ૭૦ વર્ષનો એતિહાસ બદલી નાખનાર પાર્ટીના નેતાઓ દરેક કામો માં પહેલા ક્રમાંકે કામ કરી રહ્યા છે. વિજલપોર નગરપાલિકા માં મોટાભાગના તળાવ ઉંડુ કરવા જલ સંગ્રહ કરવા માટે ગુજરાત સરકાર દિલ ખોલીને ફંડ આપે છે. અને એ ફંડ પણ વપરાય છે. પરંતુ અહિંના જાંબાજ તથાકથિત રાજનેતાઓ અને પ્રશાસનિક અધિકારીઓ સદર તળાવો માં કોઈ પણ સંજોગો માં પાણી નહિ જવા દેવા કસમ ખાદી હોય એવો દૃશ્ય નજરે પડી રહ્યા છે. ખરેખર વિજલપોર નગરપાલિકા સ્વર્ણ પદકનો પાત્ર છે.દરેક રીતે અહિંના સંબધિત તમામ અધિકારીઓને સરકારી સેવાલયનો લાભ આપવો જોઈએ. હવે ઉપરોક્ત સમાચારની ગંભીરતાથી નોધ લઈ નવસારી જિલ્લા સાથે પ્રાદેશિક કમિશ્નર સુરત અને ગાંધીનગરની મુખ્ય કચેરી કાયદેસર કાર્યવાહી કરશે ખરા કે પહેલાની જેમ એક નોટિસ આપી દરકિનાર કરશે એ જોવાનુ બાકી રહ્યુ... 

Wednesday, August 14, 2019

मानव जीवन में ध्यान का महत्व

मानव जीवन में ध्यान का महत्व 
सभी समस्याओं एवम बीमारीओ से दूर रहने के लिये एक मात्र ध्यान 

हमारे मन में अनेक प्रकार की ग्रंथिया होती है जिनमें सभी अंग क्रिया शील रूप से कार्य करते है। इसके साथ ही हमारे मन में कई कल्पनाएं और विचार भी चलते है। जो हमारे मन मस्तिष्क में कोलाहल मचाते है जिससे हमारा मन अशांत सा भटकता रहता है। लगातार सोच विचार से हमारे शरीर पर भी इसका बुरा असर देखने को मिलता है। हम कमजोर होते जाते है। जिसका असर त्वचा में भी काफी देखने को मिलता है। त्वचा मानव शरीर का सबसे बड़ा हिस्सा है। जिससे सभी अंग जुड़े होते है और त्वचा की चमक से ही हमारी सुंदरता भी प्रभावित होती है। ध्यान एक ऐसी प्राचीन भारतीय पद्धति है जिसका उपयोग काफी समय से होता आया है। जो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाकर जीवन में नवउर्जा का संचार करता है। ध्यान हमारे रोजमर्रा की जिंदगी के लिये काफी आवश्यक होता है। ये तन और मन दोनों को क्रियाशील बनाता है।
भागती दौड़ती और चिंता से ग्रस्त जिंदगी में हमारे मस्तिष्क की क्षमता कमजोर होती जाती है जिसके कारण शरीर सहित आत्मविश्वास भी कमजोर हो जाता है। तेज रफ्तार से दौड़ती दुनिया में ज्यादातर लोग रफ्तार के दबाव से टूट जाते हैं और तनाव, चिंता, अवसाद आदि के शिकार हो जाते हैं। ऐसे में ध्यान की शक्ति से मस्तिष्क की शक्ति बढ़ाकर खुद को शक्तिशाली बनाए रखा जा सकता है। 
सावधानी : ध्‍यान की शक्ति को बढ़ाने के लिए शाकाहारी होना आवश्यक है। शाकाहार में भी मिर्च, मसाला, बेसन, खट्टे पदार्थ और यहां तक कि दूध और घी का प्रयोग भी वर्जित है। यह शाकाहार सिर्फ खाने-पीने में ही नहीं, पहनने, ओढ़ने में भी होना चाहिए। अर्थात ऊन, सिल्क, फर व चमड़े की बनी कोई वस्तु या वस्त्र धारण नहीं करना चाहिए।
 
कैसे प्राप्त करें ध्यान की शक्ति :  
किसी भी सुखासन में बैठकर प्रतिदिन सुबह, शाम और रात सोते वक्त 15 मिनट का ध्यान करें। इसकी शुरुआत में मध्यम स्वर में तीन बार ॐ का उच्चारण करते हुए आंखें बंद कर लें। ध्यान के मध्य में श्वासों के आवगम को गहराएं। ध्यान के अंत में हाथों की हथेलियों से चेहरे को स्पर्श करते हुए आंखें खोल दें। फिर ध्यान के बाद 26 बार पलकें झपकाएं। अंत में ब्रह्म मुद्रा करने के बाद ध्यान का समापन करे दें।

विशेष : 40 दिनों तक ध्यान करते रहने के बाद ध्यान ‍की शक्ति का अहसास होना शुरू हो जाता है। व्यक्ति स्वयं को ऊर्जावान और हमेशा तरोताजा महसूस करता है। मस्तिष्क अच्छे तरीके से सक्रिय होकर सकारात्मक सोच का निर्माण करता है। ध्यान की शक्ति को सम्भालना जरूरी है अन्यथा कई लोग नियम और परहेज छोड़कर भी ध्यान करते हैं जिसका लाभ कम ही मिल पाता है।

ध्यान की शक्ति का लाभ :
*मस्तिष्क की शक्ति को ध्यान की सहायता से कई गुना बढ़ाया जा सकता है और जीवन के लक्ष्य प्राप्त किए जा सकते हैं।
*ध्यान से तनाव ही नहीं, पीठ का दर्द, लकवा, मांसपेशियों में खिंचाव, मधुमेह व अस्थमा जैसे रोगों का उपचार भी संभव है।
*याददाश्त बढ़ाने, मन-मस्तिष्क को एकाग्र करने, आत्मविश्वास बढ़ाने और आज के प्रतिस्पर्द्धी वातावरण के दबावों का सामना करने के लिए ध्यान की शक्ति महत्वपूर्ण सिद्ध होती है।


ध्यान  एक ऐसी क्रिया है जिसके माध्यम आप अपने जीवन की अनेक समस्याओं का निवारण कर सकती है। वैसे ही जैसे हमे अपने शरीर के पोषण और स्वास्थ्य के लिए भोजन की जरूरत है, इसके अलावा हमारी त्वचा पर भी इसका विशेष असर देखने को मिलता है। तो जानें ध्यान के माध्यम से होने वाले फायदों के बारे में।
1. बेहतर और खूबसूरत त्वचा

ध्यान आपके शरीर की कोशिकाओं एंव इंद्रियों को नियत्रिंत कर मांसपेशियों को आराम देता है और नए त्वचा कोशिकाओं का निर्माण कर हमारे शरीर को क्रियाशील बनाता है। मुक्त कणों और तनाव का मुकाबला कर चेहरे पर पड़ी झुर्रियों की समस्या को दूर करता है। बढ़ते तनाव को कम कर , हार्मोनल असंतुलन, जैसी बुराईयो तो दूर कर हमारे तन मन को तरोताजा करता है।

2. मानसिक स्वास्थ्य में सुधार
लगातार होती जीवन की भागदौड़ में अनेक प्रकार की उलझनें और तनाव आते है। जिससे हमारा मन हमेशा विचलित सा बना रहता है। ध्यान ऐसे समय में वरदान रूपी भेंट है, जिसे करके आप अपनी अंदर की उथल पुथल का काफी हद तक कम कर सकते है। क्योकि यह तनाव को कम कर शरीर को आराम पहुंचाने में अहम भूमिका निभाता है। इसके अलावा पुराने तनाव को भी कम कर सार्थक परिणाम देता है। इसलिये आपको अपने घर पर नियमित रूप से स्वच्छ जगह पर बैठकर व्यायाम करना चाहिए।

3. त्वचा हाइड्रेट

ध्यान करने से हमारा मन शांत होने के साथ शरीर में स्थिरता बढ़ती है और बीमारियों से लड़ने की क्षमता भी बढ़ती है। इससे शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है। और त्वचा की नमी को बनाये ऱखने के साथ उसे सुंदर और सुखद बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका भी अदा करता है। कई दिमागी बीमारियों को भी दूर कर मन तो शांति प्रदान करता है।

4. रक्तचाप को संतुलित करता है

तनाव बढ़ने से शरीर का रक्त चाप बढ़ने लगता है जिससे दिल की बीमारी का खतरा भी काफी बढ़ जाता है। ऐसे समय के लिये विशेषकर उच्च रक्तचाप की समस्या के लोगों के लिए ध्यान एक तैयार टॉनिक है। जिसे नजरंदाज करना सबसे बड़ी भूल हो सकती है। ध्यान करने के लिये आप 15-20 मिनट तक अपनी दोनो आँखें बंद करें और ध्यान की मुद्रा में बैठ जाएं। यही आपके स्वास्थ के लिये सबसे बड़ा टॉनिक बन सकती है।

5. तन मन को मिलती है खुशी

ध्यान करने से हमारे शरीर की ग्रंथिया सिथर रहती है मन को अपने काबू में करने की शक्ति मिलती है। जिससे मानसिक चंचलता और अस्थिरता पर नियंत्रण आता आता है। जिससे हमारा मन हमेशा तनाव मुक्त रहते हुए खुश रहता है। एक खुश मन के साथ गुस्सा करने की आदत भी धीरे-धीरे काबू में आ जाती है। पूरे दिन अच्छा और सकारात्मक माहौल बना रहता है।
ध्यान हमारे तन मन को काबू करने की एक अद्भुत दवा है जिसके लिये अब प्रमुख स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी कहते है कि अपने को स्वस्थ रखने के लिये आप इसका चयन अवश्य रूप से करते हुए 10 से 15 मिनट का समय अवश्य रूप से दें। इसके लिये आप स्वच्छ और सांत पूर्ण जगह पर बैठ कर आंखें बंद कर ध्यान में पूरी तरह से मग्न हो जाये और अपने शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दें। जिससे आप का शरीर काफी हल्का हो जायेगा और आपको इसके बाद अद्भुत शांति प्राप्त होगी।

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