Tuesday, July 9, 2019

स्वतंत्र भारत के जलते प्रश्न.. ? भगवान और इंसान ..?

 स्वतंत्र भारत के जलते प्रश्न ? 
भगवान के बारे में आप ...?
              आज हम सब जिन्हें भगवान मानते हैं। सदियों से पूजा की जा रही है। और हम भी वर्षों से पूजा कर रहे हैं। और भविष्य में भी ऐसे ही करते रहेंगें। लाखो करोडो़ रूपये खर्च हो चुके हैं। और हो रहे हैं। और ऐसे ही होते रहेंगे। हम सभी अपने अपने धर्म के अनुसार अपने अपने भगवान अलग अलग नामो से अलग अलग धार्मिक कृयाओं से अलग बिधियों से अलग अलग स्थानो से मानते हैं। पूजा पाठ यज्ञ हवन करते हैं। और ऐसी इस धरती पर करोड़ों मान्यताएं हैं। और सभी अपने अपने मान्यताओं के अनुसार ही मानते हैं। और यह सदियो से चल रहा है। आज हम अंतरिक्ष पर स्थान प्राप्त कर चुके हैं। वैज्ञानिक युग में जैसे जैसे खोज हो रहा है। हमारी बहुत सारी धारणाएं गलत भी साबित हो चुकी हैं। धरती को अचला कहा था। जब पता चला कि यह हर पल गतिमान है। गलत साबित हो गया। हमारे शरीर में खून जमा है। पता चला कि यह भी काफी तीब्र गति से चल रहा है। शरीर में एक कुदरती बायपास अलग से है यह अभी कुछ वर्ष पहले ही पता चला। ऐसे आपको लाखो करोड़ों उदाहरण मिल जायेंगे। परंतु इससे आप क्या साबित करना चाहते हैं। यह सवाल जरूर आपके विचार में आ रहा होगा। आइये उपरोक्त बातो को हम गहराई से समझें। भगवान बुद्ध महावीर जीसस आदि के पहले भी हमारी मनुष्य जाति थी। आध्यात्मिक वैज्ञानिक आधार और शाष्त्र भी इस बात से सहमत हैं कि हम सभी इनसे पहले भी थे। उदाहरण के लिए जैसे आज हम सभी विभिन्न पार्टियों कांग्रेस भाजपा बीएसपी एसपी आप  वगेरे वगेरह का एक भाग बन चुके हैं। और आज हालत बद से बदतर हो चुकी है हम आज यहाँ तक गिर चुके है कि एक दूसरे की जान तक ले लेते हैं। पार्टियों का इतना नशा छा चुका है कि हम मनुष्यता को भी इंशानियत को भी भूल जाते हैं। वही हाल हम धर्मो का कर चुके हैं। सदियां गुजर गई। हम सभी इन मान्यता ओं से इतना जकड़े जा चुके हैं कि हम अपने मूल स्वरूप को ही भूल गये। तथाकथित धार्मिक गुरूओं जिन्हे खुद भी पता नही है। हमें अपने से ही दूर कर दिया। इसे व्यवसाय बना दिया। आज के इस युग में सभी को मायाजाल से दूर रहने की आत्मा परमात्मा की बात करने वालो की हकीकत पर नजर डाल कर देखें तब पता चलता है कि सबसे बडे़ मायाजाल सबसे ज्यादा धन इन्होने ही इकट्ठा कर लिया है। और इनकी हकीकत को देखकर हमारी संस्कृति हमारी सभ्यता हमारी खोज वह आनंद वह शुकून वह निर्मलता वह हमारी प्यास सभी से घृणा होने लगी। वह महावीर की नग्नता बुद्ध की पबित्रता कबीर और रहीम सूरदास और मीरा, रैदास, जीसस, कृष्ण राम, मोहम्मद सभी को आज इन तथाकथित जो अपने आप को धार्मिक गुरु के रुप में प्रस्तुत किए सभी के असलियत के उपर नकली रंग रोगन इतना चढ़ाये इतना चढ़ाये कि आज हमारी नवयुवक पीढ़ी नफरत करने लगी है। परिणाम यह हुआ कि हम और हमारी नवयुवक पीढ़ी कमजोर से कमजोर दीन हीन हो गई। आत्मबल जैसे महान शब्द हमारे जीवन से तिरोहित हो गये हैं। आत्मा परमात्मा जैसे हमारे जीवन से बिदा हो चुके है। आनंद और शांति पूर्ण जीवन शब्दावली से ही गायब हो चुके हैं। भगवान महावीर ने जिसे खोजने में अपना जीवन लगा दिया । दिया जले अगम का बिन बाती बिन तेल।। उस अगम को इन सौदागरो ने मिटाने में जरा भी देर नही लगाई। उस दिये की जिसकी बात भगवान बुद्ध कर रहे थे। ए आज भी उसे बेधड़क बेच रहे हैं। पैगम्बर मोहम्मद सिर्फ पैगंबर बने। ए तथाकथित लोग  अपने आप को उनसे भी ऊपर समझकर सौदा कर रहे हैं। आज हालत यहाँ तक गुजर गई कि बेचने वाले और खरीदने वालो दोनो को पता नही है। बेचने वाले को पता नही कि उसे बेचा नही जा सकता। और बेचे ही चला जा रहा है। और उनसे ज्यादा हालत खराब तब देखी जा रही है कि खरीदने वालोँ की अच्छी भीड़ लगी है। करोडो़ में बिक रहा है और खरीदने वालो की भीड़ ऐसी लगी है। कि दूसरों का नंबर शायद न लगे। हर हालत में खरीदारी कर रहे हैं। आज यदि फिर से उस अलख को जगाना है फिर एक ही रास्ता बचा है। जो सभी को अलग अलग अपने अपने रास्ते से चलने की सलाह देकर भी एक कर सकता है। वह है ध्यान। ध्यान आज एक ही माध्यम है कि जिसके द्वारा हम सभी संत महात्मा ऋषि मुनियों की खोज को जानने का संकेत प्राप्त कर सकते हैं। आज इस पर हम सभी को आत्म चिंतन की जरूरत है। आज हम जिसे मानते हैं। उसे जानने की जरुरत है। जाने बिना मानने में बडा़ खतरा है। और मानने से हालत हुई है। मानने की वजह से ही आज यह दशा हुई है।जैसे जैसे हम मानने लगते हैं । हमारी जानने की खोज की दिशा बंद हो जाती है। सबसे सरल तरीके से हम भगवान को भी पाना चाहते हैं। और कुछ छोड़ने को भी राजी नही हैं। प्रकृति का नियम है कि आप को आगे जाना है फिर हर एक कदम छोड़ते जाना होगा। यह नियम जिंदगी के हर पहलू में हर पल लागू होता है। संसार और संन्यास एक साथ नही मिल सकता। यह एक सिक्के के दो पहलू की तरह है। अब इसमें जो आपको ज्यादा मूल्यवान लगता है। वही आपको मिल जाता है। जिसे आप ज्यादा मूल्यवान समझते हैं। उसी की वारंवार चर्चा करते हैं। वह आपके अवचेतन मन में प्रवेश कर जाता है।और जो आपके अवचेतन मन में प्रवेश कर जाता है उसे आप जरूर प्राप्त करते हैं। इसी मंत्र इसी रहस्य का प्रयोग कर कर हमारे तथाकथित धार्मिक हालांकि वह है नही। परंतु एक ही को इतनी बार दोहराया गया कि आज हम अपने ही असलियत को भूल गये। आज फिर से हमें अपने मूल स्वभाव को समझना होगा। और उसका एक ही माध्यम है ध्यान।।।

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