Tuesday, July 2, 2019

रक्षक बने भक्षक..? सुप्रीम कोर्ट के मनाई हुक्म के बावजूद भी धड़ल्ले से बिक रही हैं जानलेवा एलोपैथी दवायें..?

सुप्रीम कोर्ट के हुक्म के बावजूद धडल्ले से बिक रही हैं प्रतिबंधित दवाएं - RTI 

 मानव जीवन का मूल्य गांधी दर्शन के सामने ..? 
आज जब सुप्रीम कोर्ट ने 350से अधिक दवाओं को मानव जीवन को खतरा बताते हुए तुरंत बेन लगाकर उपयोग करने और तत्काल बिक्री पर बंद करने हुक्म पिछले वर्ष ही कर चुकी है। फिर भी नवसारी जिले में धडल्ले से जानलेवा प्रतिबंधित दवाएं खुल्लेआम बिक रही है। और ड्रग अधिकारी कुंभ निद्रावस्था में हैं। आज जिनके ऊपर सरकार ने बिश्वास किया। आज वही मोत के सौदागर बन गये। इन प्रतिबंधित दवाओं के उपयोग से मानव शरीर में क्या दुष्प्रभाव पड़ रहा होगा? इसे आधुनिक वैज्ञानिको ने क्यों बंद करने पर जोर दिया होगा ? सुप्रीम कोर्ट ने क्यों बेन लगाया होगा। इसकी जानकारी इन मौत के सौदागरों को क्यो नही है ? इसके पीछे का रहस्य आज सभी को पता है। परंतु क्या इसे हलके में लेना उचित होगा ? सभी विद्वानों का एक ही मंतव्य नही में ही मिला है। जिसकी विस्तृत जानकारी के लिए और मिल रही फरियादो के अनुसार पर्यावरण मानव अधिकार संस्था के गुजरात प्रदेश अध्यक्ष के द्वारा एक सूचना खोराक औषध नियमन तंत्र के मददनीश कमिश्नर नवसारी जिनकी पूरी जिम्मेदारी होती है। उन्ही से मागी गई। सुचना के अधिकार (आरटीआई) से मिली सूचना के अनुसार नवसारी जिले में औषध नियमन तंत्र के कमिश्नर श्री जिन्हे सरकार ने पूरी फोज के साथ सभी प्रकार की सुविधाओं से लसालस किया है। उस कार्यालय को  आज मौज मस्ती के पिकनिक मनाने का अड्डा समझ बैठे हैं। मिली सूचना के अनुसार अभी तक जाबांज अनुभवी अपने आपको सुप्रीम कोर्ट से भी महान समझने वाले मददनीश कमिश्नर श्री इन जानलेवा दवाओं को बंद करने में कोई दिलचस्पी नही रखते । हजारों की संख्या में चल रही इन मौत के दवाओं के बिक्री करने वालो में अभी तक चंद दुकानों में देखकर आ गये। इन जान लेवा दवाओं को तुरंत नष्ट करने और आइ पी सी धाराओं के तहत सरकारी सेवालयों मे ले जाने के बजाय खुद ही सेवा लेकर आ गये। एक सामान्य गाली गलोज तक करने वालो को आइपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत जेल तक जाना पड़ता है। और सीधे सीधे जानलेवा दवाओं को सुप्रीम कोर्ट के बेन लगाने के बावजूद बेचने के और बंद न करवाने वाले अधिकारी पर कोई कार्यवाही नही।पर्यावरण मानवाधिकार संस्था के प्रदेश अध्यक्ष द्वारा पूछे गये सवालो के सामने सुप्रीम कोर्ट के हुक्म पर सवाल उठा बैठे। शायद अभी भी चुनावो के दौरान नेताओं का लेक्चर इनके दिमाग में अभी तक छाया हुवा है। नेताओं की तरह प्रबचन दे बैठे।इन महाशय के मुताबिक आज इन सभी दवाएं जो मोत का कारण बनी हुई हैं। ऐसी दवाओं को बजार से दूर करवाने का सुप्रीम कोर्ट का हुक्म जारी न कर पाने के पीछे दवा बिक्रेताओं का नुकसान के सामने नागरिकों की जान की कीमत कुछ भी नही है। जानकारों और विद्वानों के मंतव्यों से मिली जानकारी लिखने में यहाँ शब्द ही नही है। शब्दों की गरिमा शर्मसार होने की वजह से उसको लिखा नही जा सकता। उसे समझा जा सकता है। उसे अनुभव किया जा सकता है। इन जानलेवा दवाओं के दुष्प्रभाव से जो दर्द जो पीडा़ जो तकलीफ आज हमारे बीमारियों से पीडित नागरिकों को हो रही है। और चिकित्सक असहाय नजर दिख रहा है। और अंत में जब वह अंतिम श्वास इस लिए लेने में मजबूर हो रहा है। उसे और चिकित्सा व्यवसाय में भिड़े चिकित्सको भी पता नही कि अनजाने में ऐसी जानलेवा दवाओं का प्रयोग करवाया गया है। जिसे एक डाक्टर ने अति आधुनिक खोज समझकर उसे बीमारियों से मुक्ति के लिए दिये थे। और वह जब जानलेवा सावित हो चुकी है। सरकार के इस विभाग चिकित्सा क्षेत्र के सभी एलोपैथी चिकित्सको को इसकी जानकारी उपलब्ध करवानी चाहिए। और उसके लिए तत्काल इन दवाओं को अपना दुष्प्रभाव शरीर में डाल रही हैं।उसे नष्ट करना चाहिए। और सुप्रीम कोर्ट ने हुक्म भी कर दिया। फिरभी आज इसका प्रयोग करवाया जा रहा है। इसकी जांच कर तुरंत दुकानों से बाहर करने वाले अधिकारी गण ही तर्क कुतर्कों से क्या साबित करना चाहते हैं,? इसे समझने से समय व्यतीत करने से मिले फायदो को समझने और समझाने से जो आज हो रहा है। उसे किसी भी कीमत पर माफ करना भी गुनाह होगा। जिसके लिए इस समाचार को पढ़ रहे हमारे पाठक मित्रों से गुजारिश है कि यदि आप इस मुहिम में जिसे आज हमारे पूरी दुनियां के वैज्ञानिको ने सिद्ध कर दिया है। और अंत में हमारे सर्वोच्च न्यायालय सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूरी जांच पड़ताल में गलत पाया और 350 से अधिक दवाओं की सूची जारी करते हुए प्रतिबंधित कर दिया है। आप सभी पाठक मित्र इसे अपने अपने तरीके से सोचे और इस जानलेवा दवाओं से अपने स्वजनो मित्रों परिवार धर्म देश से मुक्ति दिलवाने में मदद करें। भारत देश पहले अंग्रेजों का गुलाम था अब अंग्रेजी दवाओं का। आज हमारे ऋषि मुनियों ने सभी धर्म शास्त्रों तक में असाध्य से असाध्य बीमारियों को जड़ से खत्म करने के लिए लाखो उपाय बताये हैं। प्रकृति तक ने उसका भंडार बिना किसी कीमत के हमें उपलब्ध करवाया है। यहाँ तक कि हमारे देश में इतनी किस्म की मिट्टी है जिसके प्रयोग से हजारों रोग गायब हो जाते हैं। हमारे देश में जल चिकित्सा से भी बीमारी खत्म होती है। हमारे देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस नैसर्गिक उपचार पद्धति पर इतना जोर दिया है जितना किसी और पर नहीं। परंतु आज हमारे इस बापु के देश में ऋषि मुनियों संत महात्माओं की धरती पर ऐसे मौत के सौदागर जम कर जिंदगी के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। और गांधी बापु का पल पल नाम लेने वाले बापु की फोटो अपने कार्यालयों लगाकर नमन करने वाले उनके सिद्धांतो पर अमल करने के बजाय उनकी एक अलग चित्र को एकत्रित करने में अधिकांस लगते दिख रहे हैं। आज यदि हमारे देश को मनुष्य जाति को मजबूत बनाना है। समृद्ध और संपन्न देश बनाना है । फिर इस स्वदेशी अपनी मूल पद्धति को कम से कम अतिशीघ्र जोड़ना जरूरी होगा। और जिन दवाओं को प्रतिबंधित कर दिया है। उसके साथ इन अधिकारियों को जो आज सरकार और हमारे सर्वश्रेष्ठ सुप्रीम कोर्ट के फैसले को न मानकर मौत के सौदागर बने हैं। उन्हें उनके असली स्थान पर पहुंचे इसमें भी मदद करनी चाहिए। इस समाचार को अब किसी एक पर दोषारोपण करना जरूरी नही होगा। यह आज सभी की जवाबदेही है।

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