Monday, October 7, 2019

विजयदशमी खुशियों का पर्व कैसे मनायें ..? 40 वर्ष उम्र के उपर वाले अवश्य पढें...!

   आज दशहरा है। इसे विजय दशमी विजय का त्योहार के रूप में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। आज के दिन साधना का दिन भी माना जाता है। साधक अपनी साधनाओ को आज फिर से पुनरूक्त भी करते हैं। आज के दिन भगवान राम रावण से विजयी होने के पश्चात अयोध्या में दशहरा विजय दशमी के रूप में मनाया था। और आज भारत के सभी स्थानों पर रावण का पुतला जलाया जायेगा। पुतला बनाकर जलाने की परंपरा यह तभी से प्रसिद्ध है। आज के दिन सभी प्रकार की साधना में विजय अवश्य प्राप्त होती है। लोकरक्षक समाचार एवम पर्यावरण मानवाधिकार संस्था परिवार की तरफ से सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामना के साथ सभी अपनी मंजिल को परम पिता परमात्मा की असीम कृपा से प्राप्त करें। ऐसे शुभ आशीष के साथ आज परमात्मा के सभी साधको को उनकी अंतरतम खोज में अग्रसर होंं । आज विजय किसी वस्तु विशेष से अधिक अपने आप से पाने का मुहूर्त है। आइये हम सभी इस पावन पर्व में अपने साथ सभी को खुशहाल की कामना करें।  
विजयदशमी का आध्यात्मिक महत्व 
                 हमारे सनातन धर्म में ऋषियों, महात्माओं एवं संतों ने अपनी बात बताने के लिए एवं मानव को धर्म के गूढ़ रहस्यों को समझाने के लिए हमेशा संकेतों द्वारा समझाने का प्रयास किया है जिन लोगों ने इन संकेतों को समझ लिया वे लोग दुनिया के इस भव सागर से पार हो गये और चारों पुरुषार्थ को पाकर अन्त समय भगवत् कृपा प्राप्त करते है।

अगर इस धार्मिक संकेत को समझने का प्रयत्न करे तो कुछ इस प्रकार से इसको समझा जा सकता है-


                     हमारा शरीर पाँच कर्मेन्द्रियां और पाँच ज्ञानेन्द्रियां तथा एक मन इन ग्यारह इन्द्रियों से बना है। जिसमें से मन को आत्मा का कारक माना जाता है, आज का दिन इसी तरफ संकेत करता है कि हम अपने मन स्वरूप घोड़े को लगाम लगा,इसे संयमित कर अपने पाँचों कर्मेन्द्रियों और पाँचो ज्ञानेन्द्रियो पर विजय प्राप्त करके ही इस संसार सागर को पार कर सकते हैं। हम इस सांकेतिक ज्ञान को हर वर्ष एक त्योहार के रूप में भी मनाते है लेकिन पुनः इन्द्रियों के वशीभूत होकर इसको विस्मृत कर जाते है तथा मोह माया में फँस कर अपने जीवन की सार्थकता मात्र धन वैभव तक ही सीमित समझ बैठते है।
                      आज हजारों वर्षों से हम किसी न किसी धर्म अथवा संप्रदाय से जुड़े होने से लाखो बार एक ही विचार को दोहराते हुए अपने आप को ही भूल चुके हैं। अपनी निजता को ही भूल गये हैं। और आज के तथाकथित धार्मिक साधु संन्यासी भी इसी भीड़ में खो गये हैं। और इसी को ही अपना मूल स्वरुप मान बैठे हैं। और हालत बद से बदतर हो चुकी है। भगवान महावीर, बुद्ध ,कृष्ण पैगंबर मोहम्मद, गुरू नानक ,कबीर, रहीम ,तुलसी ,मीरा ,रैदास, सूरदास जैसे हजारों की खोज कर मार्गदर्शक को भुलाकर उन रास्तो पर जाने के बजाय उनकी मूर्ति पूजा करने लगे। आज आधुनिक वैज्ञानिक भी हमारे सभी धार्मिक ग्रंथो को मार्गदर्शक के रुप में मानकर खोज कर रहे हैं। और सभी खोंजे सफल हो रही हैं। और हम हैं कि उनके बताए रास्तों पर चलने के बजाय उनकी ही पूजा पाठ करने लगे। उनकी मूर्ति पूजा करने के हम यहाँ खिलाफ नही हैं। यह सिर्फ शुरुआत है उसके आगे भी जाना है। परंतु हम उसे ही मंजिल मानकर ठहर गये। यही हमारी भूल की शुरुआत हो गयी। और हम भटक गये। भटकते और चलते रहते फिर भी कभी न कभी अवश्य पहुंच जाते।हम इसे ही मंजिल मानकर ठहर गये। और हालत आज हमारे सामने है। आज जिनको सर्वश्रेष्ठ पदो पर होना चाहिए आज वै सब कहां हैं। लगभग सभी की हालत अब एक जैसी ही हो चुकी है। ठहरा हुवा पानी भी सड़ जाता है। हमने चलना ही बंद नही किया। हम एक प्रकार से सो गये हैं। यह एक सामान्य नियम है यदि आप किसी गाड़ी को चलाते रहें वह भी दस बीस वर्ष चलता है और यदि एक जगह रख दें फिर उसमें भी जंग लग जाता है। आज जरूरत है फिर से इन सभी के बताये हुए मार्ग पर चलने की। आइये हम सभी इस पावन पर्व के शुभ अवसर पर अपने ही मार्ग पर चलने की शुरुआत करें। आपका एक कदम भी मंजिल के करीब ही पहुंचायेगा। और यदि कहीं भी कभी भी कोई बाधा रुकावट आये जरूर संपर्क करें हम साथ साथ हैं।

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